माह-ए-रमजान को लेकर परिचर्चा
गोरखपुर। माह-ए-रमजान का आगाज अगले सप्ताह से होने वाला है इसी के मद्देनजर शुक्रवार को सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाजार में दीनी परिचर्चा आयोजित हुई। कुरआन-ए-पाक की तिलावत से शुरुआत हुई। हम्द व नात-ए-पाक पेश की गई। संचालन हाफिज रहमत अली निजामी ने किया।
मुख्य वक्ता मुफ्ती अख्तर हुसैन मन्नानी ने कहा कि जिस्म और रूह से मिलकर इंसान बना है। यूं तो साल भर इंसान खाना-पीना और जिस्मानी व दुनियावी जरूरतों का ख्याल रखता है, लेकिन मिट्टी के बने इंसान में असल चीज तो उसकी रूह होती है अल्लाह ने जिस्म व रूह की तरबियत और पाकीजगी के लिए माह-ए-रमजान बनाया है। अल्लाह भी इबादत गुजार रोजेदार बंदे को बदले में रहमतों और बरकतों से नवाजता है। यह महीना सब्र का है और सब्र का बदला जन्नत है। हमें अपनी गलतियों को सुधारने का मौका रमजान के रोजे में मिलता है।
गलतियों के लिए तौबा करने एवं अच्छाइयों के बदले बरकत पाने के लिए भी इस महीने की इबादत का महत्व है। माह-ए-रमजान बहुत ही रहमत व बरकत वाला महीना है। रमजान में कोई शख्स किसी नेकी के साथ अल्लाह का करीबी बनना चाहे तो उसको इस कदर सवाब मिलता है गोया उसने फर्ज अदा किया। जिसने रमजान में फर्ज अदा किया उसको सवाब इस कदर है गोया उसने रमजान के अलावा दूसरे महीनों में सत्तर फर्ज अदा किए। यह एक ऐसा महीना है कि जिसमें मोमिन का रिज्क बढ़ा दिया जाता है।
जो इसमें किसी रोजेदार को इफ्तार कराए तो उसके गुनाह माफ कर दिए जाते हैं और उसकी गर्दन जहन्नम की आग से आजाद कर दी जाती है। यह महीना बंदे को तमाम बुराइयों से दूर रखकर अल्लाह के करीब होने का मौका देता है। इस माह में रोजा रखकर रोजेदार न केवल खाने-पीने कि चीजों से परहेज करते हैं बल्कि तमाम बुराइयों से भी परहेज कर अल्लाह की इबादत करते हैं। हकदार मुसलमानों की जकात, सदका व फित्रा से मदद जरूर करें।
अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर मुल्क में शांति, तरक्की व भाईचारगी की दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई। परिचर्चा में हाजी बदरूल हसन, मुहम्मद रूशान, नेहाल अहमद, मुजफ्फर हसनैन रूमी, मुहम्मद आसिफ, मुहम्मद ज़ैद, अली अफसर, मुहम्मद जमाल, नेहाल अहमद, एस.एफ. अहमद, कारी मुहम्मद अनस रजवी आदि मौजूद रहे।





