आलम रिज़वी
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था कभी सोच की आज़ादी, अलग-अलग विचारों और खुली बहस की पहचान रही है। विश्वविद्यालय सिर्फ़ डिग्री देने की जगह नहीं थे, बल्कि समाज को रास्ता दिखाने वाले केंद्र हुआ करते थे। लेकिन आज यूजीसी (University Grants Commission) से जुड़े नए बिल और प्रस्तावों ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या शिक्षा अब जनता की ज़रूरत से ज़्यादा सत्ता की ज़रूरत बनती जा रही है?
यूजीसी की स्थापना का मकसद था कि विश्वविद्यालय आज़ाद रहें और पढ़ाई का स्तर ठीक बना रहे। लेकिन हाल के प्रस्तावों में यूजीसी की भूमिका कम कर, ज़्यादा ताक़त केंद्र सरकार को देने की कोशिश दिखाई देती है। यही बात आम जनता, शिक्षक, छात्र और राज्य सरकारों को परेशान कर रही है।
शिक्षा का केंद्रीकरण:
किसके फायदे में?
शिक्षा भारतीय संविधान में समवर्ती विषय है, यानी इसकी ज़िम्मेदारी केंद्र और राज्य दोनों की है। लेकिन यूजीसी से जुड़े नए प्रावधान राज्यों की भूमिका को कमज़ोर करते दिखते हैं। जब पाठ्यक्रम, नियुक्तियाँ, मान्यता और पैसा जैसे अहम फैसले दिल्ली से होंगे, तो स्थानीय ज़रूरतें और अलग-अलग इलाक़ों की पहचान कैसे बचेगी?
यह सवाल सिर्फ़ राजनीति का नहीं, जनता के हक़ का सवाल है।
आम छात्र की चिंता
पब्लिक का सबसे बड़ा डर यह है कि शिक्षा धीरे-धीरे महँगी होकर निजी हाथों में न चली जाए। जब सरकारी संस्थानों की आज़ादी घटेगी और पैसे का दबाव बढ़ेगा, तो फीस बढ़ना तय है। इसका सीधा असर गरीब, ग्रामीण और मध्यम वर्ग के छात्रों पर पड़ेगा, जिनके लिए शिक्षा ही आगे बढ़ने का सबसे बड़ा सहारा है।
विश्वविद्यालयों में शिक्षक सिर्फ़ कर्मचारी नहीं होते, बल्कि सोच और समझ देने वाले लोग होते हैं। नए ढाँचों में भर्ती और प्रशासन पर बढ़ते नियंत्रण से यह डर पैदा हुआ है कि अलग राय रखने वालों को पीछे कर दिया जाएगा। अगर शिक्षक खुलकर नहीं बोल पाएँगे, तो छात्र आज़ाद सोच कैसे सीखेंगे?
सरकार की बात और ज़मीनी हकीकत
सरकार कहती है कि इन सुधारों से पढ़ाई का स्तर सुधरेगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा मिलेगी। यह बात कागज़ों में अच्छी लगती है, लेकिन हकीकत यह है कि अच्छी शिक्षा आदेश देने से नहीं, बल्कि आज़ादी और सही निवेश से आती है। दुनिया के बेहतरीन विश्वविद्यालय इसलिए आगे हैं क्योंकि वहाँ सरकार नहीं, ज्ञान सबसे ऊपर होता है।
पब्लिक के सवाल, जवाब कौन देगा?
क्या शिक्षा नीति जनता से बात किए बिना बदली जाएगी?
क्या विश्वविद्यालय सरकारी दफ़्तर बनकर रह जाएँगे?
क्या शिक्षा का मकसद सिर्फ़ नौकरी रह जाएगा, सोच और सवाल खत्म हो जाएँगे?
यूजीसी पर हो रहे बदलाव सिर्फ़ एक क़ानूनी प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि भारत की सोच और समझ से जुड़ा मामला हैं। जनता सरकार से टकराव नहीं चाहती, लेकिन शिक्षा पर एकतरफ़ा दबाव भी मंज़ूर नहीं कर सकती।
अगर शिक्षा कमज़ोर होगी, तो लोकतंत्र भी कमज़ोर होगा।
और अगर सवाल पूछने की आज़ादी खत्म हुई, तो नुकसान सिर्फ़ विश्वविद्यालयों का नहीं, पूरे समाज का होगा।
आज ज़रूरत सुधार की है, क़ाबू की नहीं।
सुनने की है, थोपने की नहीं।





