सिद्धार्थनगर। नगर पालिका परिषद के महंत अवैद्य नाथ सभागार में छठवें दिवस की राम कथा में वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो उठा, जब अयोध्या धाम की पावन धरती से आए परम पूज्य बालशुक, अंतरराष्ट्रीय कथावाचक पंडित देव कृष्ण शास्त्री ने श्रीराम चरित मानस के जनकपुर प्रसंग का अद्भुत और हृदयस्पर्शी वर्णन प्रस्तुत किया। कथा स्थल पर उपस्थित हजारों श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर भगवान श्रीराम की लीलाओं का रसपान करते रहे। कथावाचक ने कहा कि जहां भक्ति का जन्म होता है, वहां भगवान स्वयं पधारते हैं।
प्रभु सनातन धर्मार्थ सेवा ट्रस्ट के तत्वावधान में सिद्धार्थनगर धर्मार्थ सेवा संस्थान की ओर से आयोजित श्रीराम कथा में कथावाचक पंडित देव कृष्ण शास्त्री ने चौपाई “पुर नर नारि सुभग सूचि संता, धरमसील ज्ञानी गुन वंता” का भावार्थ समझाते हुए बताया कि जनकपुर में प्रत्येक नर-नारी संतस्वभावी, धर्मशील, ज्ञानवान और सद्गुणों से भरा हुआ है। इसका मुख्य कारण है कि यही वह दिव्य भूमि है जहां स्वयं भक्तिरूपी जगत जननी मां जानकी का प्राकट्य हुआ। कहा कि मानस में वर्णित तीन पुरियों अयोध्यापुरी, जनकपुरी और लंकापुरी में जनकपुरी सर्वश्रेष्ठ है।
उन्होंने कहा कि जनकपुरी में कोई असंत नहीं, क्योंकि जहां भक्ति जन्म ले, वहां कलह, क्रोध, द्वेष और अहंकार अपने आप समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि जनकपुर में जितने प्राणी हैं, वे सभी भगवान राम के अनन्य भक्त माने गए हैं। उन्होंने बताया कि राजा जनक के दरबार में विभिन्न देशों से आए राजा-महाराजा अपने मन में अहंकार पाले बैठे थे कि वे शिवजी का पवित्र धनुष पिनाक तोड़कर सीता जी से विवाह करेंगे। लेकिन भगवान का उद्देश्य उन सबके अभिमान को चूर-चूर कर देना था। भगवान राम ने न केवल पिनाक धनुष को सहजता से उठा लिया, बल्कि उसके भंग होने से संपूर्ण जनकपुर गूंज उठा।
इसके बाद भगवान श्रीराम और मां जानकी का पावन विवाह संपन्न हुआ, जिसे सृष्टि का दिव्यतम मिलन माना जाता है। शास्त्री ने इस प्रसंग से शिक्षा देते हुए कहा कि मनुष्य यदि अपने हृदय से अहंकार दूर करके भक्ति का स्थान दे दे, तो भगवान तक पहुंचने में कोई बाधा नहीं रहती। भक्ति, विनम्रता और धर्म का संदेश देने वाली शास्त्री जी की वाणी ने जनसमूह को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। छठवें दिवस की कथा के समापन पर भक्तों ने जयकारों के साथ भगवान श्रीराम और माता जानकी के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित की।





