संभल अवधनामा संवाददाता शासन से प्राप्त निर्देशों के अनुसार आज को एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत महाविद्यालय में कर्मचारियों के साथ पौधारोपण किया गया। उर्दू विभाग के प्रोफेसर डॉ आबिद हुसैन हैदरी ने वृक्षों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए पृथ्वी पर रहने वाले जीव एवं मानव के लिए वृक्षों को अति आवश्यक बताया। जीवन का अस्तित्व ही वृक्षों पर निर्भर है। पौधा रोपण समिति के सदस्य दुष्यंत मिश्र ने बताया की वृक्ष हमारी राष्ट्र की अमूल्य निधि है।
लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार की प्राप्ति होती है। सनातन संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक वृक्षों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है।कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने वृक्षों के महत्व को भारतीय संस्कृति और जीवन में गहराई से समझाया है। उन्होंने कहा कि वृक्ष, जल, और रोटी, ये तीनों जीवन के अभिन्न अंग हैं। उन्होंने मातृभूमि की मिट्टी और वन-सम्पदा के महत्व को समझने और वनों के संरक्षण पर जोर दिया.
दुष्यंत मिश्रा ने आगे बताया कि वृक्ष भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। आश्रमों और तपोवनों में ही हमारी सुंदरतम और श्रेष्ठतम संस्कृति का उद्भव हुआ है। प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनियों के तप स्थल एवं अनुसंधान केंद्र वनों में ही थे। साथ ही वनों में वृक्षों के नीचे गुरुकुल एवं प्रयोगशालाएं संचालित होती थी। इसी परिप्रेक्ष्य में महर्षि चरक का भी प्रसंग आता है जो सर्वविदित है।
महर्षि चरक के गुरु ने उनसे वन में जाकर ऐसे वृक्ष लाने को कहा ,जो किसी औषधि में काम ना आते हो, लेकिन चरक खाली हाथ लौट आए ,गुरु जी के पूछने पर महर्षि चरक ने उत्तर दिया गुरुदेव ऐसी कोई वनस्पति नहीं है, जो औषधि में काम ना आती हो अर्थात सभी वृक्ष औषधि गुण से परिपूर्ण है।
वनों में ही हमारे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, और भगवद गीता इनमें से अधिकतर ग्रंथों की रचना वनों में ही हुई, इसलिए वनों में लिखे जाने के कारण इन्हें आरण्यक कहां जाता है।
वनों का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है. वृक्षों का महत्व न केवल पर्यावरण की दृष्टि से है, बल्कि यह हमारी संस्कृति और सभ्यता से भी जुड़ा हुआ है वृक्ष जीवन, संस्कृति, और पर्यावरण के लिए आवश्यक है। वृक्षारोपण में धर्म प्रकाश, ,मुन्नन , सोनू,रमेश, सुमंत, मोहम्मद उमर एवं हर स्वरूप का विशेष सहयोग रहा।





