Sunday, April 12, 2026
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सन् हिजरी: उम्मत-ए-मुसल्लिमा केलिये नाजुक मोड़

अली संजर नियाज़ी
मुर्करमीः मौजूदा हालात को देखते हुए उम्मत-ए-मुसल्लिमा केलिऐ नाजुक मोड़ सामने हैं। अगर गुजरे हुए ज़माने के रिकार्ड पर नज़र डाली जाये तो उस वक्त मुसलमानों की मआशी हालत निहायत ही अच्छी थी यानी उस वक्त मआशी हालात, इस्लाहात, फलसफियात, अर्जियात, रियाजियात, कीमियात, फलकियात, माहौलियात, दीनियात, इस्लामियात, सियासियात, जंगलात, माहौलियात, हैवानात, इल्मुलहिन्दसा और खानदानी मनसूबा-बन्दी (फैमिली प्लानिंग) से अच्छी तरह वाकिफ थे। इतनी वाक्फियत होने के साथ उनका मुकाम बुलन्द-तरीन था। इसी लिये सारी दुनिया इज्जत की निगाहों से देखती थी क्योंकि इतनी मालूमात के साथ ही एखलाक व आदाब व किरदार से भी मामूर (लबरेज़) थे। निम्नलिखित मुस्लिम कौम के एखलाक व आदाब मुलाहिजा फरमाएं।
मुस्लिम कौम दुनिया में एक मानी हुई अच्छी कौम थी। गै़रकौमें भी तसलीम करती थीं कि मुसलमान कामिल ईमान होता है। मुसलमान कभी झूठ नहीं बोलता, गोया मुसलमान का अर्थ है सच बोलने वाला, मुसलमान का अर्थ है इंसाफ करने वाला, मुसलमान का अर्थ है रहम करने वाला, मुसलमान का अर्थ है दूसरों के दुःख-सुख में काम आने वाला, इसलिए मुसलमानों के मजहब को आला-तरीन मजहब कहा गया और मुसलमानों के एखलाक व मोहब्बत को भी पूरी दुनिया तसलीम करती है। मुसलमान की अच्छइयों का सबब यह है कि मुसलमानों का रहनुमा (पथ-प्रदर्शक) अच्छा था। क्योंकि जैसा रहनुमा होता है वैसी ही उसकी कौम बन जाती है। मिसाल के तौर पर रहनुमा मिस्ल सांचा है लिहाजा जैसा सांचा होगा पूरी कौम उसी सांचे में ढली हुई होगी। इसी तालीमात का नतीजा था जिससे मुस्लिम कौम तेज रफतारी से आगे बढ़ रही थी। मगर आज…….??
इसी एखलाक व आदाब के मद्दे-नजर प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी ने फरमाया था:
‘‘हजरत मोहम्मद (स.) इल्म और हमदर्दी में यकीन रखते थे।’’ (अवधनामा उर्दू डेली लखनऊ 30 अप्रैल 2018)
यानी इसका मतलब यह हुआ कि इल्म सबसे बड़ी दौलत है और हमदर्दी सबसे बड़ी इबादत है। इल्म से मुराद है कि जिसने इल्म सीखा और दूसरों तक पहुंचाया लेकिन उसपर अमल नहीं किया तो इल्म का मकसद ही फौत (खत्म) हो जायेगा। इल्म सीखने के साथ ही अमल करना भी जरूरी है। ऐसे ही हमदर्दी है यानी किसी के साथ इंसानी सुलूक करना, हुस्न-ए-एखलाक से पेश आना, तफरीक न करना, किसी को बुरा-भला न कहना, भूखे को खाना खिलाना, सबके साथ अच्छे सुलूक करना, ये सब हमदर्दी के अव्वल पहलू हैं। मेरी मालूमात की हद तक आजादी के बाद से किसी भी प्रधानमंत्री ने इस किस्म का बयान नहीं दिया जो प्रधानमंत्री मोदी जी ने पेश किया है। इसलिये मोदी जी ऐसे वाहिद शख्सियत हैं जिनका आला मर्तबत, अच्छी जेहनियत, और तालीमी अहलियत (इल्मी काबिलियत) का पता चलता है।
पहला मोड़ः जबसे मुसलमान कई फिर्को में तकसीम हुए अपने आप को बहुत कुछ समझने के बाद हक-परस्त कहने लगे कि हम हक पर है। और साथ ही साथ अन्य फिरके पर जाहिल, ना-अहल और तआन-व-तौहीन (तुच्छ) करने लगे। तबसे ज़वाल (पतन) आना शुरू हो गया। यानी किसी भी फिरके ने आगे बढ़ने की कोशिशें नहीं कीं और न ही अपनी खामियों को दूर किया। इसी वजह से जो ज़वाल आया तो धीरे-धीरे मौजूदा हालात में पेवस्त हो गया। आज मुसलमानों के हालात दलितों से भी बदतर हो गयें हैं।
दूसरा मोड़ः मेरे प्रिय-मित्र जनाब प्रशांत गौरव बनारसी साहब ने बात ही बात में दरियाफत फरमाया कि ‘‘हुजूर (स.) की विलादत और हिजरत में तकरीबन 7-8 साल का फर्क है क्या इससे पहले भी इतना ही फर्क था?’’ यह सवाल बहुत अहमियत का हामिल है। इसी सिलसिले में इस पर थोड़ी सी रौशनी डालना निहायत जरूरी है।
इसका मतलब यह हुआ कि हर गैरमुस्लिम कौमें इंटरनेट पर किसी भी मजहब के बारे में बाकायदा तहकीकात कर रही हैं। ‘‘हजरत मोहम्मद (स.) का जन्म’’ टाइप करने पर इंटरनेट से पूरी तफसील सामने आ जाती है। गूगल पर हुजूर (स.) की विलादत 22 अप्रैल, 571 ईस्वी है लेकिन इतिहासकारों ने 570 ईस्वी लिखा है। हुजूर (स.) की हिजरत विलादत से 50 साल बाद हुई यानी 622 ईस्वी में सन् हिजरी का आगाज हुआ और वफात 632 ईस्वी यानी सन् 11 हिजरी में हुई। और सारे इस्लामी त्यौहार हिजरी के हिसाब से मनाए जाते हैं। अख्बारों में हिजरी की तारीख के साथ अंग्रेजी तारीख भी लिखी जाती है। 12 रबीउल-अव्वल 1440 हिजरी को हुजूर (स.) की विलादत के कितने साल हुए? अगर 2018 ईस्वी से 571 ईस्वी घटा दिया जाए तो 1447 साल हो रहें हैं और हिजरी चल रही हैं 1440। यानी सात या आठ साल का फर्क आ रहा है। यह सन् हिजरी तीन सौ साल बाद हुजूर (स.) की विलादत से भी आगे निकल जाएगी।
दूसरी बात यह है कि निज़ाम-ए-श्शम्सी के एक दिन व एक रात (24 घन्टे कुछ सेकण्ड) होते हैं और निज़ाम-ए-क़मरी (23 घन्टे 56 मिनट) होते हैं यानी पूरे चैबीस घन्टे नहीं होते। इसलिए माहाना (मासिक) दौरानिया 29.53 दिन होते हैं और सालाना (वार्षिक) दौरानिया 354.36 दिन होते हैं। यही शम्सी और क़मरी में 11 दिन का फर्क है। अगर फर्क वाला 43.5 साल जोड़ दें तो 1483.5 हिजरी हो जाएगी तब सोलहवीं सदी लगने में 16.5 साल रह जाएंगे। अगर 43.5 साल घटा दिया जाए तो 1396.5 हिजरी यानी 14वीं सदी चल रही है, 15वीं सदी शुरू होने में 3.5 साल बाक़ी हैं। अगर आज इसपर ग़ौर नहीं किया गया तो यह साइंस व टेक्नालोजी सन् हिजरी के साथ-साथ बड़े-बड़े मज़हबी माहिरीन की खोपड़ी को मरोड़ कर रख देगी।
तीसरा मोड़: ईस्वी और हिजरी में 11 दिन से फर्क ‘‘रूयत-ए-हिलाल और चांद ग्रहन’’ (26 अगस्त 2018) में लिख चुके हैं। एक साल में 11 दिन तो 100 साल में 1100 दिन यानी 3.38 साल। एक हज़ार साल में ग्यारह हजार दिन यानी 31 साल। दस हजार साल में एक लाख दस हजार दिन यानी 310 साल। बीस हजार साल में दो लाख बीस हजार दिन यानी 620 साल (यहीं पर ईस्वी से हिजरी टकराएगी यानी हजरत ईसा (अ.) की विलादत से आगे निकल रही होगी), तीस हजार साल में तीन लाख तीस हजार दिन यानी 930 साल (इस दौरान हिजरी ईस्वी को पीछे छोड़ते हुए काफी आगे निकल चुकी होगी।) जब 620 साल बाद हिजरी ईस्वी से टकराएगी तो गै़रकौमें उम्मत-ए-मुसल्लिमा से सवाल कर देंगी।
ऐ मुसलमानो! हजरत मोहम्मद (स.) को दुनिया में तशरीफ लाए आज कितने साल हो रहे हैं?
इसपर मिलजुल कर गौर करना होगा और सच्चाई सामने लानी होगी। वरना सवाल खड़े होंगे तो उम्मत-ए-मुसल्लिमा कश्मकश में पड़कर किधर जाएगी? हिन्दू कौम में जाएंगी नहीं, यहूदी कौम को कुबूल करेंगी नहीं, तब ईसाई कौम कहेगी अच्छा आओ मेरे मजहब में शामिल हो जाओ। फिर दीन व मजहब को कौन संभालेगा? इसलिए तमाम बुजुर्गान-ए-दीन उलमा-ए-किराम से गुजारिश है कि अभी सवेरा है तअस्सुब, तकब्बुर व तफरीक को खत्म करके जितनी जल्दी हो सके उम्मत-ए-मुसल्लिमा को प्लेटफार्म पर लाने की भरपूर कोशिश की जाए। अब अतिरिक्त 1400 साल गुजरने न दिया जाए। अगर अब भी आपने हिकमत-ए-अमली से काम न लिया तो नतीजा यही आएगा:
‘‘उठें और मुत्तहिद होकर नए अज्म व इरादे के साथ कश्मकश की कश्ती को बाहर लाने की कोशिश करें।’’
मुअज्ज़िज़ क़ारईन-ए-किराम! मुरासिले के जरिया हमारा मकसद किसी की दिलाजारी नहीं बल्कि उम्मत-ए-मुसल्लिमा के ज़मीर (अंतात्र्मा) को जगाना है, ताकि इस साइंस व टेक्नालोजी के दौर में समझने और आगे बढ़ने की कोशिश करे।
486/32, बब्बूवाली गली, डालीगंज, लखनऊ-226020
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