विकास शर्मा “दक्ष”
यादों का सिलसिला चलता रहा,
ज़ख्म मेरा भी नासूर बनता रहा,
वो कल रात ना आया लौट कर,
चिराग इंतज़ार का जलता रहा,
मुफलिसी का इक मरीज़ था वो,
जो किश्तों में रोज़ ही मरता रहा,
उसके अपनों ने ही किया क़त्ल,
ताउम्र दूसरों के लिए लड़ता रहा,
बदनामी का शोर था गली-गली,
चुपचाप दिल में वो सब सहता रहा,

जल गया वो आतिश-ए-हसद में,
ना जाने कैसे ठंडी आहें भरता रहा,
“दक्ष” जैसे तैसे वक़्त कटता रहा,
बेवजह ही ये दिल मचलता रहा,
https://www.youtube.com/watch?v=j3zpe5yTHd4&t=3s
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