Tuesday, April 7, 2026
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ऐसा प्रयास करे जिससे कि हमारी संस्कृति और हमारी विरासत की रक्षा हो सके

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इमामबाड़ा सिब्तैनाबाद जो भारत सरकार के पुरातत्व सर्वे (ए.एस.आई.)के अंतर्गत वर्ष 1919 से एक संरक्षित स्मारक है ,अपना अस्तित्व खोने की कगार पर था। अवध के चौथे बादशाह अमजद अली खान (1842-1847)के मकबरे एवं इमामबाड़े के रूप में इस भव्य इमारत का निर्माण वर्ष 1847 में हुआ था। इमामबाड़े का निर्माण बादशाह अमजद अली खान के दुवारा प्रारम्भ कराया गया था और उनकी मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र और अवध के आखिरी बादशाह वाजिद अली शाह दुवारा 10 लाख रूपये की लागत से यह इमामबाड़ा बनवाया गया था एवं इसकी कुल आरजी 16 बीघा से ज्यादा थी। 

https://www.youtube.com/watch?v=y4MDKvJYqVQ

सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजो के दुवारा लखनऊ की लगभग समस्त ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट किया गया था और इस इमामबाड़े को भी बहुत बुरी तरह नुकसान पहुंचा था।
इस इमामबाड़े का प्रयोग 1858 से 1860 के मध्य चर्च के रूप में भी हुआ था जिसमे उस समय के वाइसरॉय लार्ड कैनिंग के दुवारा एक प्रार्थना सभा में भी प्रतिभाग किया गया था। इमामबाड़े की सम्पत्तियो को वर्ष 1921 में लखनऊ इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (अब लखनऊ विकास प्राधिकरण)को बेच दिया गया था। 
अमजद अली शाह के जीवन ,इमामबाड़े की अंधकार से उजाले की ओर यात्रा तथा इमामबाड़े की समिति तथा इमामबाड़े के मुतवल्ली मोहम्मद हैदर के प्रयास ,भारतीय पुरातत्व सर्वे के कुशल निर्देशन में हुए जीणोद्धार एवं रखरखाव तथा इमामबाड़े से जुड़े रोचक तथ्य एवं अत्यंत दुर्लभ जानकारियों के परिपूर्ण एक पुस्तिका के रचना मोहम्मद हैदर एवं डॉ सनोबर हैदर के द्वारा की गयी है जिसकी शीर्षक है “सिब्तैनाबाद थ्रू दि लेंस ऑफ़ टाइम” जो की इस इमामबाड़े की 170 साल की यात्रा का एक वृतान्त है। 
डॉ सनोबर हैदर इतिहासकार एवं राजकीय महाविद्यालय में प्रवक्ता है लखनऊ के बारे में उनके द्वारा अनेको लेख लिखे जा चुके है। इमामबाड़े के स्वर्णिम इतिहास एवं उज्जवल भविष्य की कामना लिए यह पुस्तिका लखनऊ वासियो ,स्कूल के छात्रों ,शोधार्थियों एवं हर उस व्यक्ति के लिए है जो की अपनी सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा करने में अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन करने हेतु प्रयासरत है। इस पुस्तक में अधिवक्ताओ। इतिहासकारो ,पुरातत्वविदों ,सांस्कृतिक धरोहर के प्रेमियों एवं धर्म गुरुओ के उद्द्गार एवं संदेश है जो की अत्यंत उत्साहवर्धक है। 
इस पुस्तक के प्रकाशन का मंतव्य सिब्तैनाबाद के संघर्ष की गाथा को जन जन तक पहुंचाना है जिससे हम सब मिलकर एक ऐसा प्रयास करे जिससे कि हमारी संस्कृति और हमारी विरासत की रक्षा हो सके। 
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