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सी.एस.आई.आर.-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-आईआईटीआर), लखनऊ और नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, कार्यालय-3, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठी ;पर्यावरण प्रदूषण : चुनौतियाँ एवं रणनीतियाँ” का सीएसआईआर-आईआईटीआर में मुख्य अतिथि, प्रोफेसर मदन लाल ब्रह्म भट्ट, कुलपति, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ ने उद्घाटन किया । प्रोफेसर आलोक धावन, संरक्षक, संगोष्ठी एवं निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अतिथि गण को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया । डॉ॰ आलोक कुमार पाण्डेय, संयोजक, संगोष्ठी ने मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण बहुत महत्वपूर्ण विषय है, यह गौरव की बात है कि हम इस पर हिंदी माध्यम में विचार मंथन कर रहे हैं ।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति सभी को जागृत कराना है । डॉ. योगेश्वर शुक्ला, अध्यक्ष ने संगोष्ठी का परिचय देते हुए कहा कि प्रदूषण के कारण सांस संबंधी रोग, त्वचा – रोग आदि अनेक बीमारियाँ बढ़ रही हैं जो गंभीर चिंता की बात है । हम आधुनिक विकास में काफी आगे हैं, परंतु प्रकृति के संरक्षण में पर्याप्त कार्य नहीं कर पाए हैं । हम जागरूकता के माध्यम से पर्यावरण को स्वच्छ बना सकते हैं । इस संगोष्ठी का यही उद्देश्य है कि वातावरण को स्वच्छ बनाने हेतु आवश्यक कार्यों के प्रति सभी को जागरूक किया जाए ।

डॉ. अश्विनी दत्त पाठक, अध्यक्ष, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, कार्यालय-3, लखनऊ एवं निदेशक, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ ने अपने संबोधन में कहा कि पहले प्राकृतिक रूप से कृषि होती थी परंतु उत्पादन बढ़ाने हेतु अनेक रासायनिक खादों का अधिक उपयोग होने लगा, इससे उत्पादन तो बढ़ा लेकिन पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसी अनेक समस्याएँ सामने आने लगीं । आज फिर प्राकृतिक रूप से फसलें उगाने की आवश्यकता है, जिससे ऐसी समस्याएँ उत्पन्न न हों । इस संगोष्ठी में जो चर्चा होने जा रही है, वह मानव हित में बहुत उपयोगी होगी। डॉ. रजनीश चतुर्वेदी, सह संयोजक संगोष्ठी ने मुख्य अतिथि का परिचय दिया । मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन में कहा कि आज स्वास्थ्य सर्वाधिक सार्थक विषय है । यह गौरव की बात है कि हम इस संगोष्ठी में पर्यावरण संरक्षण पर विचार मंथन कर रहे हैं । मनुष्य की जीवन शैली ही प्रदूषण का मुख्य कारण है । हमें ऐसी जीवन शैली अपनानी चाहिए जिससे प्रदूषण न हो । फसलों के अवशेष जलाए नहीं जाएं । घरों के अंदर प्रदूषण कम करने के हर संभव उपाए किए जाएं । घरों का हवादार होना आवश्यक है । राज मार्गों के किनारे आवासीय कालोनी नहीं बनाई जाएँ । शहरों में बड़े – बड़े पार्क बनाए जाएं, यह स्वास्थ्य के लिए हितकर है ।

जिससे स्वास्थ्य संबंधी बढ़ती समस्याओं को रोका जा सके । पश्चिमी देशों में औसत आयु 80 से 85 वर्ष है परंतु हमारे देश में लगभग 70 से 75 वर्ष है । 1901 और 1947 के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में औसत आयु कम थी परंतु चिकित्सीय सुविधाओं में सुधार के कारण अब हमारे देश में भी औसत आयु में बढ़ोत्तरी हुई है । इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने संगोष्ठी की स्मारिका का विमोचन भी किया। प्रोफेसर आलोक धावन, संरक्षक, संगोष्ठी एवं निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने कहा कि प्रदूषण न हो यह अच्छी बात है, यदि हो गया तो कैसे दूर करें यह चिंता की बात है ।पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, इसकी जानकारी लगभग सभी को है, परंतु प्रदूषण को कैसे दूर किया जाए, यही विचार करना है । शहरों में वाहन कम कर दिए जाएं या बंद कर दिए जाएं, कारखाने बंद कर दिए जाएं, इससे काम नहीं होगा । प्रदूषण दूर करने हेतु वैज्ञानिक समाधान ढूँढना होगा । इस चुनौती को वैज्ञानिकों के सामने रखकर इसका स्थायी समाधान खोजना होगा। अमरीका में कचरे से एनर्जी बनाई जा रही है, ऐसे ही समाधान खोजने होंगे । इस संगोष्ठी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की जानकारी आम आदमी तक पहुंचाने के लिए एक सशक्त प्रयास किया जा रहा है।

इस संगोष्ठी में सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं, अनुसंधान और विकास संस्थानों, विश्वविद्यालयों एवं विदेशों से 100 से अधिक वैज्ञानिक-गण, शोध छात्र प्रतिभागिता कर अपना लेख/शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे। वैज्ञानिकों एवं शोध छात्रों के बीच संगोष्ठी के विषय पर व्यापक चर्चा से पर्यावरण प्रबंधन हेतु नवीन विचार प्राप्त होंगे। आशा है कि हिंदी भाषा के माध्यम से प्रदूषण निवारण के बारे में समाज को जागृत करने तथा प्रत्येक व्यक्ति तक संदेश पहुंचाने के प्रयास में हमें आप सभी का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। उद्घाटन समारोह के अंत में श्री चन्द्र मोहन तिवारी, समन्वयक, संगोष्ठी ने धन्यवाद ज्ञापित किया । संगोष्ठी के प्रथम प्रस्तुतीकरण में डॉ. अनुपमा कुमार, आस्ट्रेलिया ने ‘’माइक्रोप्रदूषक : जल में छिपे हुए खतरे‘’ पर बताया कि माइक्रोप्रदूषकों के अंतर्गत कीटनाशक, बायोसाइड्स, मानव और पशु चिकित्सा फार्मास्यूटकल, उपभोक्ता उत्पादों और औद्योगिक रसायनों इत्यादि को शामिल किया गया है। अपशिष्ट जल के ठीक से उपचार न होने के कारण जलीय तंत्र प्रभावित हो रहा है। हमें जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी एवं जल में मौजूद माइक्रोप्रदूषकों के मिश्रण से उत्पन्न जोखिमों के प्रभाव को समझने की आवश्यकता है। इस संबंध में जानकारी गुणवत्ता मानकों के विकास में प्रगति करेगी जो गंगा कायाकल्प जैसे कार्यक्रमों के लिए सहायक होगी। द्वितीय प्रस्तुतीकरण में प्रोफेसर सूर्यकान्त, केजीएमयू, लखनऊ ने ‘’वायु प्रदूषण एवं स्वास्थ्य’’ पर प्रस्तुतीकरण में बताया कि उद्योग, वाहन, प्रदूषण में वृद्धि, शहरीकरण के कारण वायु प्रदूषण बढ़ता है। बच्चों में बड़ों की तुलना में वायु प्रदूषण का प्रभाव अधिक होता है। इसके कारण ऑंखों में जलन, छाती में जकड़न, फेफड़ों का कैंसर और हृदय रोग होता है। तृतीय प्रस्तुतीकरण में डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी, सीआईएआई, भोपाल ने ‘’कुपोषित बच्चों के लिए पूरक खाद्य पदार्थो का विकास’’ के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि कुपोषण के कई कारण हैं कि जिसमें गरीबी, सामाजिक, आर्थिक स्थिति, जन्म पूर्व देखभाल, जन्म, प्रजनन क्षमता, बच्चे में बीमारी और मॉं में कुपोषण शामिल है। कुपोषण बचपन में मौत का प्रमुख कारण है। इससे दुनिया भर में 33 प्रतिशत से अधिक बच्चों की मौत होती है। पोषक तत्व की आवश्यकता के लिए सोयाबीन आटा, तिलहन वाले भोजन, अनाज, आलू, फलों की उपलब्धता शामिल है। उत्पाद में उच्च ऊर्जा और पोषक तत्व, घनत्व, स्वीकार्यता और जीवाणु संदूषण के प्रतिरोध जैसे फायदे हैं। चौथे प्रस्तुतीकरण में डॉ. विवेक दीक्षित, एम्स ने ‘’भारत में नदियों की स्थिति’’ के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि विश्व में भारत में नदियों की दुर्दशा सबसे ज्यादा है। नदियों में प्रदूषण बढ़ रहा है, जिसके लिए कोई कार्य नहीं किया जा रहा है। गांवों और शहरों में लगभग सभी कुएं सूख गए हैं। पीने के पानी का संकट गहराया है। हमारे देश में 16 बड़ी नदियां हैं, जिस पर देश का एक चौथाई भू-भाग निर्भर करता है। लगभग सभी नदियां प्रदूषण की भेंट चढ़ गईं हैं। हमें नदी के अस्तित्व के लिए जन आंदोलन का हिस्सा बनना पड़ेगा। पांचवे प्रस्तुतीकरण में डॉ. चन्द्र मोहन नौटियाल, बीरबल साहनी, पुराविज्ञान संस्थान, लखनऊ ने ‘’ऊर्जा तथा पर्यावरण के अंतर-सम्बन्ध पर बताया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण तथा जलवायु से हर किसी का सरोकार है। ऊर्जा का सीधा सम्बन्ध विकास तथा पर्यावरण से है। बढ़ता तापमान, उठता समुद्र तल, डूबते द्वीप, पिघलते हिमनद और लुप्त होती प्रजातियां हमें कारणों और निदान पर विचार के लिए विवश कर देते हैं। जलवायु परिवर्तन कृषि पर भी प्रभाव डालेगा। ऊर्जा बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते।
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