Thursday, February 26, 2026
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हादसों के लिए सरकारें जिम्मेदार

सैयद निजाम अली

पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन के नाम से मशहूर भारत रत्न डा.एपीजे अब्दुल कलाम ने देश को २०२० तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया था लेकिन अब जबकि इसमें दो साल का समय रह गया है दूर-दूर तक नहीं लगता कि भारत अगले दस सालों में भी विकसित राष्ट्र बनेगा। देश में रेलगाड़ी आवागमन का अभी सबसे सस्ता व सुगम साधन है लेकिन रेलवे कही से विकसित होने के मूड में नहीं है। देश में इस वक्त २८ हजार रेलवे फाटक है और इसमें से नौ हजार मानवरहित। इन मानवरहित फाटकों पर हर महीने देश के अलग-अलग हिस्सों में हादसे होते रहते और लोग काल के मुंह में समाते रहते है लेकिन केंद्र सरकार इस तरफ ध्यान नहीं देती।

गुरुवार को कुशीनगर में एक मानवरहित रेलवे फाटक पर एक स्कूली वैन टे्रन से टकरा गयी जिसमें १३ मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत हो गयी। इसमें एक ही परिवार के तीन बहन भाई और चार लोगों के दो-दो बच्चे भी हैं। इस हादसे में स्कूल के वाहन चालक  को दोष सबसे ज्यादा है जो हादसे के वक्त एयरफोन लगाये था जबकि बच्चे चिला रहे थे कि टे्रन आने वाली है लेकिन चालक ने इसे सुना ही नहीं

 

क्योंकि वह एयरफोन लगाये थेा।

पिछले साल सितंबर में रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि एक साल में सभी मानवरहित रेल फाटकों पर लोग तैनात कर दिये जायेंगे लेकिन घोषणा के सात माह गुजरने के बावजूद भी एक भी फाटक पर कोई आदमी तैनात नहीं किया गया।

सवाल यह होता है कि क्या रेलवे को इंसानी जिंदगी की कोई कीमत नहीं मालूम या उसको इसकी कोई अहमियत नहीं है। पहले कहा गया था कि सेटेलाइट से इसकी निगरानी की जायेगी लेकिन इस पर भी कोई काम नहीं हो रहा है। वैसे इसके लिए जितना दोषी रेलवे है उतना ही हम सब है। हम देखते कि रेलगाड़ी आ रही है और चंद लम्हों के लिए रेललाइन पार करने लगते हैं। अगर कोई दिमागी तौर से कमजोर आदमी यह काम करता रहता है तो समझ में आता है लेकिन पढ़े लिखे लोग यह काम करते दिखते हैं। २६ अप्रैल को कुशीनगर में जो दर्दनाक हादसा हुआ उसमें सभी बच्चे आठ से १२ साल की उम्र के भी थे। जिन मां-बाप के बच्चे दर्दनाक हादसे में मरे उनक ी सारी जिदंगी तड़पते गुजरेगी। सरकारे गलतियों से सबक लेती लेकिन देश की सरकारे किसी गलती से सबक न लेने की कसम खा चुकी है। हादसे होते रहे मासूम मरते रहे

 

देश का करोड़ों अरबों का नुकसान होता  रहे लेकिन चंद लाइन की संवेदना व्यक्त करके सरकार में बैठे लोग अपना फर्ज पूरा कर लेते है। सवाल यह है कि इन नौ हजार मानवरहित रेलवे फाटक पर अगर आदमी नियुक्त हो जाये तो कितना खर्च आयेगा जबकि उससे हजार गुना ज्यादा विजय माल्या, नीरव मोदी बैंकों का मार कर जाकर विदेश में  ऐश की जिदंगी गुजारते है। दूसरे देशों में इस तरह की एक भी घटना हो जाती है तो वहां के लोग सत्ता में बैठे लोगों की नींद हराम कर देते है लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की ही तरह ही देश का आम आदमी भी संवेदनहीन हो गया है जो चंद लम्हों बाद ही ऐसे हादसों को भूल जाता है और उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। आजादी के ७१ साल बाद भी हम उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे  हैं। स्कूल व कालेजों की बस में सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं होते न ही स्कूल का कोई अंडेंट बस में होता है। अगर स्कूल का अंटेडेंट बस में होता तो वह स्कूल के वाहन चालक को मानवरहित रेलवे फाटक न पार करने देता।

स्कूल व कालेजंों में जो बस व मारुति वैन लगी होती है वह ज्यादातर खटारा होती और उसमें बच्चे जानवरों की तरह भरे होते हैं। यहीं नहीं जो रिक् शे भी

 

स्कूली बच्चों को लेकर जाते है वह भी एक रिक्शे पर छह से सात बच्चों को पटरे लगाकर बैठा लेते है। ज्यादातर ड्राईवरों के पास

ड्राइविंग लासेंस नहीं होता न तो कभी परिवहन विभाग के लोग और न ही स्कूल व टैै्रफिक पुलिस के लोग इन चीजों की जांच करते हैं। इसी तरह स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था का भी आलम है। घटना के कुछ दिन बाद सीसीटीवी कैमरों की बात उठती है लेकिन देखा यह जा रहा है कि राजधानी लखनऊ तक में आधे से ज्यादा स्कूल व कालेजों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे है तो दूरदराज के जिलों व गावों के स्कूल व कालेजों का क्या हाल होगा। हर तरफ लापरवाही व बदहवासी का आलम है।

 

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