Wednesday, April 1, 2026
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गुजरात में बैलेट से नहीं, बुलेट से होगा चुनाव 

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गुजरात में बैलेट से नहीं, बुलेट से होगा चुनाव 
 
गुजरात विधानसभा चुनावों का बिगुल बजने ही वाला है यह संभावना है कि दिसंबर के दूसरे सप्ताह में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं क्योंकि गुजरात विधानसभा का कार्यकाल 22 जनवरी 2018 तक है और उससे पहले नयी सरकार का चयन होना है .
गुजरात चुनाव को लेकर जहाँ अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बहुत चिंतित हैं वहीँ सभी राजनैतिक संभावनाओ को टटोला जा रहा है ।जहाँ विपक्ष के लिए यह 2019 का सबसे बड़ा टेस्ट है वहीँ मोदी मैजिक का भी सवाल है ।क्योंकि प्रधानमंत्री का यह गृह राज्य है। यही से वह प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे हैं ऐसे में अगर भारतीय जनता पार्टी गुजरात विधानसभा में पराजित होती है तो देश में मोदी लहर समाप्त होने का स्पष्ट संदेश जायेगा ।यह जहाँ विपक्ष के लिए संजीवनी का काम करेगा वहीँ बीजेपी के लिए घातक होगा।
गुजरात में जिस तरह के हालात बन रहे हैं उससे भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किलें साफ़ दिखाई दे रही हैं लेकिन कांग्रेस भी बहुत अच्छे हाल में नहीं है। अभी हाल में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान जिस तरह की टूट फूट हुई और शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस को अलविदा कहा उसने कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है ।हालाँकि शंकर सिंह वाघेला के स्वयं चुनाव न लड़ने के एलान और बीजेपी एवं कांग्रेस दोनों के विरूद्ध प्रचार करने की घोषणा ने कांग्रेस को राहत ज़रूर दी है ।
राहुल गाँधी द्वारा गुजरात में जाकर फिर वही गलती दोहराना जो इससे पहले वह लगातार करते आये हैं घातक हो सकता है। लेकिन कांग्रेस अपनी गलतियों से सीख लेने को तैयार नहीं दिख रही है। राहुल गाँधी गुजरात में भी मोदी सरकार की असफलताओं का बखान कर रहे हैं और गुजरात के मुद्दों कि जगह मोदी को निशाना बनाये हुए हैं जो नकारात्मक राजनीत कांग्रेस कर रही है उसके परिणाम अभी तक खराब ही आये हैं ।
यह तो कांग्रेस की चिंताएं हैं ,वहीँ बीजेपी भी कम चिंतित नहीं है क्योंकि 2012 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी का वोट प्रतिशत में अंतर  सिर्फ 9 प्रतिशत ही रह गया जबकि 2002 में यह 10.4% तथा 2007 में 9.49% था ।वहीँ एक बात और गौर करने की है बीजेपी का वोट प्रतिशत 2002 के मुकाबले 2012 में 1.95% गिरा है वहीँ कांग्रेस का भी .55% वोट कम हुआ है वहीँ 2002 में जहाँ बीजेपी ने 127 सीटें जीती थी वहीँ 2012 में 115 ही जीत पाई जबकि कांग्रेस 2002 में 51 सीटे ही जीत पायी थी लेकिन उसको 2012 में 10 सीटे अधिक मिली और उसकी संख्या 61 पहुँच गयी ।
लेकिन कांग्रेस को 2014 लोकसभा चुनाव में पूरे देश की तरह गुजरात में बड़ा नुक्सान हुआ जहाँ पार्टी 26 में से एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई वहीँ उसे मात्र 32.9% ही वोट मिले जबकि बीजेपी को 59.1% वोट मिला
जबकि पाटीदार समाज का बड़ा समर्थन भारतीय जनता पार्टी के साथ था अब गुजरात कि कुल जनसँख्या का लगभग 12.5 % पाटीदार समाज लगभग बीजेपी से दूरी बना चुका है और उनके नेता हार्दिक पटेल ने यहाँ तक कहा है कि यदि मेरे पिता जी भी बीजेपी से चुनाव मैदान में आते हैं तो समाज का कोई भी व्यक्ति उन्हें वोट न दे ।.हार्दिक पटेल ने बीजेपी का खुला विरोध कर दिया है और हाल की घटनाओं को देखते हुए समाज उनके साथ खड़ा दिखाई देता है ।वहीँ दूसरी तरफ दलित और आदिवासी समाज भी बीजेपी से खफा दिख रहा है गुजरात में 2011 कि जनगणना के अनुसार जहाँ 7% दलित हैं वहीँ लगभग14% आदिवासी लोग रहते हैं जो गुजरात में कांग्रेस का कभी आधार वोट बैंक थे ,लेकिन बीजेपी के पाले में जाने के बाद लगातार उसी के साथ बने हुए थे लेकिन केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से जिस प्रकार दलितों का उत्पीडन हुआ है और उनके साथ गुजरात में हिंसा हुई है उससे इनका मोह भंग हुआ है।
 ऊना में जिस तरह तीन दलितों को मारा गया और उसके बाद लगातार जिस तरह कि घटनाये हुई उससे पूरे दलित समाज में आक्रोश है और यह समाज भी अब गोलबंद हो रहा है क्योंकि खुद गुजरात सरकार ने गुजरात के 11 राज्यों को दलितों के प्रति क्रूरता के लिए अतिसंवेदनशील घोषित किया हुआ है ।
बीजेपी लगातार कोशिश में है कि दलितों को रिझाया जाये और वापस इन्हें अपने पाले में खड़ा किया जाये । इसके लिए खुद प्रधानमंत्री कोशिशें कर रहे हैं जिसका ताज़ा मामला अभी सरदार सरोवर बाँध के उद्घाटन के अवसर पर देखने को मिला ,प्रधानमंत्री ने लगातार सरदार पटेल के साथ बाबा भीम राव अम्बेडकर का ज़िक्र किया और बड़ी चतुराई से पंडित नेहरु का नाम लेने से बचते दिखाई दिए ।
बीजेपी कि चिंताएं इतनी ही नही हैं 2015 में संपन्न हुए ज़िला पंचायत चुनाव में भी बीजेपी को धक्का लगा है ।
 33 ज़िला पंचायतों में 2010 में कांग्रेस ने मात्र 1 सीट जीती थी वहीँ अब 2015 में उसने 24 सीटें जीत ली जबकि बीजेपी 2010 में 30 सीटें जीतने में सफल हुई थी जोकि 2015 में 6 पर सिमट गयी ।
 का वोट प्रतिशत भी कम हुआ जहाँ 2010 में यह 50.26% था वहीँ घट कर 2015 में 43.97 % रह गया  । कांग्रेस का वोट प्रतिशत 44% से बढ़ कर 47.85 % हो गया वहीँ तालुका पंचायत में भी भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा है ।
2015 में संपन्न हुए तालुका पंचायत चुनावों में कांग्रेस ने 46% वोट हासिल कर 134 सीटों पर कब्ज़ा किया और भारतीय जनता पार्टी को मात्र 67 सीटों पर संतोष करना पड़ा ।
उसका वोट प्रतिशत भो 42.32 रहा जबकि 2010 में बीजेपी ने 48.51% वोट हासिल कर 150 सीटों पर कब्ज़ा किया था और कांग्रेस को मात्र 26 सीट मिली थी और उसका वोट प्रतिशत 42.42 रहा था ।
ग्रामीण अंचल में बीजेपी की साख कमज़ोर हुई है इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है लोगों का मोह भंग हुआ है। जहाँ एक ओर ग्रामीण अंचल से आये नतीजों ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को परेशान किया है वहीँ शहरी क्षेत्र से भी संदेश सही नहीं है।
 जहाँ 56 नगरपालिकाओं में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 2010 में  29.59% था वह बढ़ कर 2015 में  39.59% हुआ है यानि सीधे तौर पर 10% वोट अधिक मिला है । वहीँ बीजेपी को 3.1% प्रतिशत का नुक्सान हुआ है, जहाँ बीजेपी को 2010 में 47.77% वोट मिला था वही 2015 में उसे 44.66% वोट हासिल हुआ ।
 
जबकि 6 नगरपालिकाओं में भी कुछ ऐसा ही परिणाम रहा है। कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ कर 33% से 41.12% हुआ है अर्थात 8.12% वृधि ।जबकि बीजेपी का वोट प्रतिशत 51.68 से 50.13% यानि 1.55%  की कमी ।
इस प्रकार बीजेपी का ब्लड प्रेशर बढ़ना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है ।नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के गुजरात से बाहर जाते ही जहाँ आनंदी बेन पटेल ने कमान संभाली और जिस तरह से वह पाटीदार समाज के आन्दोलन को रोकने में विफल रही। गुजरात मॉडल का फ्लॉप शो और लगातार दलितों के प्रति बढ़ती हिंसा ने बीजेपी का खुमार लोगों के सर से उतारने में भूमिका निभाई ,खुद कैग ने माना कि प्रधानमंत्री द्वारा संचालित कौशल विकास योजना गुजरात में विफल हुई है यह साफ़ संकेत देता है कि किस तरह प्रशासनिक असफलता ने आज पार्टी को सोचने पर मजबूर किया है ।
वहीं वर्त्तमान मुख्यमंत्री विजय रुपानी भी जनता के साथ संपर्क उस तरह साधने में नाकामयाब रहे हैं जैसा अब तक प्रधानमंत्री साधते रहे हैं ।
ऐसे में बीजेपी के लिए गणित के आकडे अनुकूल नहीं लग रहे ।यानि सिर्फ बैलेट के बलबूते चुनाव जीतना मुमकिन नहीं दिख रहा है क्योंकि 7% दलित 14% आदिवासी 12.5% पाटीदार समाज और लगभग 9% मुस्लिम यानि जिनका जोड़ लगभग 42.5%बनता है इनकी नाराज़गी के साथ चुनावी समर आसान नहीं होगा ।
 
ऐसे में जब राजनैतिक हवा ज़ोरों पर चल रही है प्रधानमंत्री ने अलादीन का चिराग घिस कर बुलेट ट्रेन निकाली है और इसका महिमामंडन किया जा रहा है। इससे क्या फायेदा होगा या क्या नुक्सान यह बहस का विषय नहीं है देश के विकास में यदि बुलेट ट्रेन सहयोगी है तो सभी को इसका स्वागत करना चाहिए लेकिन बीजेपी ने बैलेट की जंग में बुलेट को उतार दिया है अब देखना यह है कि बुलेट, बैलेट को कितना प्रभावित करती है क्योंकि गुजरात चुनाव बैलेट से नहीं बुलेट से होने जा रहे हैं |
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