Friday, February 27, 2026
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एक काल्पनिक गाँव की वास्तविक कहानी

बालेंदु द्विवेदी का नाम हिंदी साहित्याकाश में नए उपन्यासकारों में एक अत्यंत उदीयमान और प्रतिभावान साहित्य के रूप में लिया जाने लगा है। बालेन्दु द्विवेदी का जन्म मूलत: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद के ब्रह्मपुर नामक गाँव में हुआ तथा उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उनके अपने ही गाँव के मारुति नंदन प्राथमिक विद्यालय तथा लल्लन द्विवेदी इंटर कालेज में हुई। उन्होंने इंटरमीडिएट की पढ़ाई (1989-1991)चौरी चौरा के ऐतिहासिक स्थल स्थित गंगा प्रसाद स्मारक इंटर कालेज से की और आगे की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक (1991-1994)और परास्नातक (1994-1996) से की। बालेन्दु निरंतर अपने जीवन की नकारात्मक परिस्थितियों से जूझते रहे,संघर्ष करते रहे।लेकिन बालेन्दु के लिए यह संघर्ष भी संजीवनी की ही तरह था-उनके जीवन के अनुभवों को परिपक्वता शायद इन्हीं संघर्षों से मिली और शायद इन जीवन-संघर्षों ने उन्हें लेखन की ओर उन्मुख भी किया।आज वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनके प्रथम उपन्यास ‘मदारीपुर जंक्शन’(2017) की हिंदी साहित्य में जो धूम है,उनकी नींव पड़ी इलाहाबाद में और वह परवान चढ़ा बहराइच जनपद में।उन्हें यह उपन्यास पूरा करने में लगभग साढ़े तीन साल लगे।
देखे बालेंदु द्विवेदी की कहानी उन्ही की जुबानी 

https://www.youtube.com/watch?v=gm9A6JsKgeU&t=349s

अपने प्रकाशन के समय मदारीपुर जंक्शन लखनऊ में प्रख्यात कवि और समीक्षक अशोक चक्रधर के हाथों यह विमोचित हुआ (4 December 2017)और फिर देश के विभिन्न शहरों में भी इसका विमोचन का चलन शुरू हुआ.इंदौर में लिटरेचर फेस्टिवलके दौरान इसका विमोचन प्रसिद्ध नारीवादी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने किया और झाँसी में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुरेंद्र दूबे ने.प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा बालेंदु को कलम ईस्ट कार्यक्रम में भुवनेश्वर में बतौर लेखक आमंत्रित
किया गया और वहां मौजूद पाठकों ने इनके उपन्यास की भरपूर सराहना की। उपन्यास की अपनी लोकप्रियता का आलम यह था कि अपने प्रकाशन के एक माह के भीतर ही प्रथम संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गईं.यह प्रकाशन जगत और हिंदी उपन्यास जगत का एक नया रिकार्ड था।जनवरी,२०१८ में विश्व पुस्तक मेले में वाणी प्राशन ने इसका दूसरा संस्करण निकाला और मेले में यह सर्वाधिक चर्चित पुस्तकों में से रही.पुस्तक मेले में ही इलाहाबाद की संस्था दि थर्ड बेल के रंग निर्देशक आलोक नायर ने इसके नुक्कड़ नाटक के मंचन का बीड़ा उठाया और फिर बाद में उन्होंने इलाहाबाद के उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र और लखनऊ के बाबू बनारसी दास यूनिवर्सिटी के डाक्टर अखिलेश दास आडिटोरियम में इसका भव्य मंचन किया.कई दूसरी भाषाओं मसलन उड़िया की मुक्ति आदि नाट्य संस्थाओं ने भी इसके मंचन में रुचि दिखाई और इस पर काम शुरू किया।
मदारीपुर जंक्शन की समीक्षाएं देख के बड़ी पत्रिकों में छपीं.शायद ही कोई ऐसा प्रमुख दैनिक पत्र हो जिसमे मदारीपुर जंक्शन की समीक्षा न छपी हो.शीघ्र अवधि में अपनी लोकप्रियता और पाठक वर्ग के विस्तार के चलते मदारीपुर जंक्शन केवल हिंदी भाषा तक ही सीमित नहीं रही,बल्कि इसके अंग्रेज़ी,उर्दू और उड़िया आदि विविध भाषाओं में अनुवाद का कार्य आरंभ हुआ और फ़्रांस की सबसे बड़ी प्रकाशन कंपनी ने ही इसके प्रकाशन में अपनी रुचि दिखाई। बालेंदु द्विवेदी को उनके सामाजिक-साहित्यिक क्षेत्र में इस योगदान के लिए लखनऊ की डाक्टर खुर्शीद जहां फाउंडेशन ने उन्हें सर सय्यद अहमद खान के वार्षिक पुरस्कार से सम्मानित किया.बालेन्दु वर्तमान में अपने नए उपन्यास ‘वाया फुरसतगंज’ के लेखन में व्यस्त हैं,जो इलाहबाद की पृष्ठभूमि पर केंद्रित है.अब पाठकों की उम्मीदें आसमान पर हैं.बालेन्दु इसे अपन सौभाग्य मानते हैं और चुनौती भी।
पुस्तक-परिचय
यह उपन्यास अपने ग्रामीण कलेवर में कथा के प्रवाह के साथ विविध जाति-धर्मों के ठेकेदारों की चुटकी लेता और उनके पिछवाड़े में चिंगोटी काटता चलता है।वस्तुतः उपन्यास के कथानक के केंद्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश का मदारीपुर-जंक्शन नामक एक गाँव है जिसमें एक ओर यदि मदारीमिज़ाज चरित्रों का बोलबाला है तो दूसरी ओर यह समस्त विद्रूपताओं का सम्मिलन-स्थल भी है।इस लिहाज़ से मदारीपुर-जंक्शन अधिकांश में सामाजिक विसंगतियों-विचित्रताओं का जंक्शन है।

मदारीपुर के प्रतिनिधि चरित्रों में कदाचित् ऊँची कही जाने वाली बिरादरी के छेदी बाबू और बैरागी बाबू हैं।साथ में साये की तरह उनके तमाम साथी-संघाती भी मौजूद हैं।ये सभी चरित्र पूरी कथा में न केवल अपनी सम्पूर्ण मेधा के साथ उपस्थित रहकर आपसी खींचतान के नग्न-प्रदर्शन से अपने पतन की इबारत लिख रहे हैं बल्कि लंगीमारी, अड़ंगेबाज़ी, पैंतरेबाज़ी , धोखेबाज़ी, मक्कारी, तीन-तिकड़म में आकंठ निमग्न रहते हुए अपने नीच करतबों पर खुलकर अट्टहास भी कर रहे हैं। दूसरी ओर गाँव के निचली कही जाने वाली बिरादरी के वे चंद लोग हैं जो धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं,अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं और सामाजिक-राजनीतिक बराबरी के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं।चइता इसी संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है।लेकिन इस संघर्ष में वह परले दर्जे की घटिया गँवई राजनीति और षड्यंत्र का शिकार हो जाता है और
अंतत: उसकी बलि चढा़ दी जाती है।फिर उसकी लड़ाई को आगे ले जाने के लिए पत्नी मेघिया सहित उसके समाज के लोग किस तरह एकजुट होकर कोशिशें करते हैं और इस प्रयास को भी अंत-अंत तक कैसे छिन्न-भिन्न करने के कुटिल षड्यंत्र रचे जाते हैं,यह सब कुछ दिखाना बल्कि इसे उघाड़कर सामने रख देना ही उपन्यासकार का मूल मंतव्य है।
कथानक का परिवेश ठेठ ग्रामीण है और उसके परिवेश का ताना-बाना इस क़दर बारीक बुना गया है कि हम क्षणभर में ही अतीत के समुंदर में गोते लगाने लगते हैं।ज्यों-ज्यों यह गहराई बढ़ती जाती है,हमें इसका हर दृश्य और चरित्र जाना-पहचाना और भोगा हुआ-सा लगने लगता है।ऐसा लगता है जैसे सब-कुछ हमारे आस-पास घट रहा है।भाषा की रवानी और ताज़गी कथा के प्रवाह को गति देती है।पूरी कथा में क़दम-दर-क़दम नए-नए मोड़ आते रहते हैं जिसके कारण पाठक के मन में निरंतर प्रश्नाकुलता की स्थिति बनी रहती है।यद्यपि अंत में नरेटर हमें जिस निराश मन:स्थिति में अकेला छोड़कर चुपके से विदा हो लेता है,वहाँ हम अपनी आँखों से ज्यादा अपने हृदय को नम होता हुआ पाते हैं।


मदारीपुर गाँव उत्तर प्रदेश के नक्शे में ढूँढें तो यह शायद आपको कहीं नहीं मिलेगा, लेकिन निश्चित रूप से यह गोरखपुर जिले के ब्रह्मपुर नाम के गाँव के आस-पास के हजारों-लाखों गाँवों से ली गई विश्वसनीय छवियों से बना एक बड़ा गाँव है जो भूगोल से गायब होकर उपपन्यास में समा गया है। उल्लेखनीय है कि ब्रह्मपुर वह स्थान है जहाँ उपन्यासकार बालेन्दु द्विवेदी का बचपन बीता। मदारीपुर में रहने वाले छोटे-बड़े लोग अपने गाँव को अपनी संपूर्ण दुनिया मानते हैं। इसी सोच के कारण यह गाँव संकोच कर गया और कस्बा होते-होते रह गया। गाँव के केंद्र में ‘पट्टी’ है जहाँ ऊँची जाति के लोग रहते हैं। इस पट्टी के चारों ओर झोपड़पट्टियाँ हैं जिनमें तथाकथित निचली जातियों के पिछड़े लोग रहते हैं। यहाँ कभी रहा होगा ऊँची जाति के लोगों के वर्चस्व का जलवा! लेकिन आपसी जलन, कुंठाओं, झगड़ों, दुरभिसंधियों और अंतर्कलहों के रहते धीरे-धीरे अंततः पट्टी के इस ऊँचे वैभव का क्षरण हुआ। संभ्रांत लोग लबादे ओढ़कर झूठ, फरेब, लिप्सा और मक्कारी के वशीभूत होकर आपस में लड़ते रहे, लड़ाते रहे और झूठी शान के लिए नैतिक पतन के किसी भी बिंदु तक गिरने के लिए तैयार थे। पट्टी में से कई तो इतने ख़तरनाक थे कि किसी बिल्ली का रास्ता काट जाएँ तो बिल्ली डर जाए और डरपोक इतने कि बिल्ली रास्ता काट जाए तो तीन दिन घर से बाहर न निकलें। फिर निचली कही जाने वाली बिरादरियों के लोग अपने अधिकारों के लिए धीरे-धीरे जागरूक हो रहे थे और समझ रहे थे – पट्टी की चालपट्टी..! एक लंबे अंतराल के बाद मुझे एक ऐसा उपन्यास पढ़ने को मिला जिसमें करुणा की आधारशिला पर व्यंग्य से ओतप्रोत और सहज हास्य से लबालब पठनीय कलेवर है। कथ्य का वक्रोक्तिपरक चित्रण और भाषा का नव-नवोन्मेष, ऐसी दो गतिमान गाड़ियाँ हैं जो मदारीपुर के जंक्शन पर रुकती हैं। जंक्शन के प्लेटफार्म पर लोक-तत्वों के बड़े-बड़े गट्ठर हैं जो मदारीपुर उपन्यास में चढ़ने को तैयार हैं। इसमे स्वयं को तीसमारखाँ समझने वाले लोगों का भोलापन भी है और सौम्य दिखने वाले नेताओं का भालापन भी। प्रथमदृष्टया और कुल मिलाकर ‘मदारीपुर-जंक्शन’ अत्यंत पठनीय उपन्यास बन पड़ा है। लगता ही नहीं कि यह किसी उपन्यासकार का पहला उपन्यास है।


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