तीसवें दौर की सालाना मजलिस में कराई गई अलम ताबूत की ज़ियारत

परवरदिगार ने इंसान को पैदा किया इबादत के लिए,इबादत को तक़वे के लिये तक़वा ही कामयाबी की ज़मानत है

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तीसवें दौर की सालाना मजलिस में कराई गई अलम ताबूत की ज़ियारत

अवधनामा संवाददाता


बाराबंकी (Barabanki) । तीसवें दौर की सालाना मजलिस में कराई गई अलम ताबूत की ज़ियारत । बादे मजलिस हुई नौहा खानी व सीनाज़नी । मजालिसे मवद्दत को नाराज़गी का ज़रीया न बनाएं इश्क़े अली अ. में आपसी इत्तेहाद पैदा करें। शीया जुज़वे आइम्मा है इसके अन्दर शीयत के शरायत होना ज़रूरी है। जिनमें शीयत के शरायत नहीं होते वो शीया नहीं हो सकता। करबला में हुसैन ने दीन के साथ इंसानियत को भी बचाया । जिनमें गुस्सा पीने की सलाहियत होती है उसका ग़ुस्सा शजाअत की अलामत होता है। यह बात असद नगर के अज़ाख़ाना सरवर अली में आयोजित तीसवीं सालाना मजलिस को ख़िताब करते हुए आली जनाब मौलाना फ़ैज़ अब्बास मशहदी साहब क़िबला ने  कही । जो इबादात को मंज़िल समझते हैं वो अस्ल मंज़िल तक कभी नहीं पहुंचते ।परवरदिगार ने इंसान को पैदा किया इबादत के लिए , इबादत कोपैदा किया तक़वे के लिये तक़वा ही कामयाबी की ज़मानत है ।   इबा आखिर में करबला वालों के मसायब  पेश किए जिसे सुनकर सभी रोने लगे। मजलिस से पहले डा.रज़ा मौरानवी ने पढ़ा -जब शहन्शाहे वफ़ा नहर से प्यासा निकला , कितने दरियाओं के माथे से पसीना निकला । शब की चलती हुई नब्ज़ों ने भी दम तोड़ दिया , शाम के जिस्म से जब हुर का सवेरा निकला ।अजमल क़िन्तूरी ने पढ़ा - बहरे मिदहत जो तेरे इल्म से क़तरा पाया , यूं लगा तश्नए ग़ुफ़्तार ने लहजा पाया 

मेहदी नक़वी ने पढ़ा - नैज़े पे करके रन में तिलावत हुसैन ने ,  क़ुरआन की बढ़ाई है अज़मत  हुसैन ने। मजलिस का आग़ाज़ तिलावत ए कलाम ए इलाही से मौलाना हिलाल अब्बास ने किया । अन्जुमन ग़ुन्चये अब्बासिया व मातमी दस्ता ज़ैद पुर ने नौहा खानी व सीनाज़नी की । जफ़र अब्बास ज़ैदी व हसन अब्बास ज़ैदी के यहाँ भी नौहाख्वानी व सीनाज़नी के साथ अलम व  ताबूत की  ज़ियारत कराई गई । बानिये मजलिस हाजी सरवर अली करबलाई व पिसरान ने सभी का शुक्रिया अदा किया।