मारफ़ते इमाम के बग़ैर मारफ़ते परवरदिगार मुमकिन नहीं - मौलाना ज़ैग़ाम अर रिज़वी

हर ज़माने के लोगों के लिए अपने वक़्त के इमाम को पहचाना ख़ुदा को पहचानना है

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मारफ़ते इमाम के बग़ैर मारफ़ते परवरदिगार मुमकिन नहीं - मौलाना ज़ैग़ाम अर रिज़वी

अवधनामा संवाददाता

बाराबंकी । बादे रसूल सबसे अफ़ज़ल किरदार का नाम फ़ातिमा है। फ़ातिमा जंनत की औरतो की सरदार हैं। जो फ़ातिमा का इमाम है वही मेरा इमाम है । जो मां अपने बच्चों की ज़बान अल्लाह ने नाम से शुरू कराती है उनके बच्चे ही बलन्दी हासिल करते हैं । यह बात जनपद के ग्राम केसरवा सादात के इमामबाड़े में मजलिस ए अज़ा ए फ़ातमियां को ख़िताब करते हुए आली जनाब मौलाना सैयद ज़ैग़ाम अर रिज़वी ने कही । मौलाना ने यह भी कहा कि जाहिल इंसान को आलिम बनाया जा सकता है । लेकिन आलिम को जाहिल नहीं बनाया जा सकता है।मारफ़ते परवरदिगार हासिल करो ताकि उसकी सही इबादत कर सको । हर ज़माने के लोगों के लिए अपने वक़्त के इमाम को पहचाना ख़ुदा को पहचानना है । परवर दिगार महशर में हर इंसान को उसके वक़्त के इमाम के साथ बुलायेगा । फ़ातिमा उस ज़ात का नाम है जिसकी ताज़ीम में अल्लाह का रसूल खड़ा हो जाता है । मारफ़ते इमाम के बग़ैर मारफ़ते परवरदिगार मुमकिन नहीं । अपने वक़्त के इमाम को पहचाने बग़ैर जो मर जाता है उसकी मौत जाहिलियत की मौत होती है । आख़िर में फ़ातिमा ज़हरा व करबला वालों के मसायब पेश किए जिसे सुनकर सभी रोने लगे । मजलिस से पहले डा . रजा मौरानवी ने पढ़ा - हर तरह मदह सराई की हवा है क्या है , मिदहते फ़ातिमा रूहो की ग़िज़ा है क्या है । कौन जन्ज़ीर ए दरे फ़िक्र हिला देता है , ये फ़रिश्ता है कि इल्हाम ए खुदा है क्या है । अजमल किन्तूरी ने पढ़ा - इस लिए हर लब्ज़ मिदहत का अज़ीमुश्शान है , फ़ातिमा जद्दा मेरी ततहीर का उनवान है। डा. मुहिब मौरानवी  ने पढ़ा - किस तरह लिक्खे कलम तेरा क़सीदा ज़हरा । कभी कूज़े में समाता नहीं दरिया ज़हरा ।  ऐसा दरिया भी किया ख़ल्क ख़ुदा ने जिसका ,एक कनारा अली एक कनारा ज़हरा । हाजी सरवर अली करबलाई ने पढ़ा - बादे   पदर ये   हाल   तुम्हारा    है  फातिमा , पहलू के साथ दिल भी शिकश्ता  है  फातिमा । अनवारे  पन्जतन  का  तआर्रुफ़  तो  देखिये । रब  ने  वसीला   तुमको  बनाया  है  फातिमा । ज़की रसूल पुरी ने पढ़ा - ग़मे हुसैन में जो आके बहाये आंसू  , वो सच्चे मोती में तबदील हो गये आंसू । समर अब्बास और अली जाफ़र ने कुछ इस तरह से मसायबी कलाम पेश किया कलमा गो हंसते  रहे फ़ातिमा रोती रही  और सय्यदा के लाल हो गये शहीद ।  मजलिस का आग़ाज तिलावते कलामे इलाही से सैयद मोहम्मद मेहदी रिज़वी ने किया। अन्जुमन ज़ीनत उल ईमान केसरवा सादात ने नौहाख्वानी और सीना जनी की ।बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया ।