समाजवादी गढ़ बचाने के लिए दरकार, सख्त फैसलों व बदलाव की

अब भी न चेते समाजवादी तो लुटिया डूबनी तय

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समाजवादी गढ़ बचाने के लिए दरकार, सख्त फैसलों व बदलाव की

अवधनामा संवाददाता

बाराबंकी (Barabanki)। बाराबंकी जिले (विशेष कर संघर्षरत समाजवादी गढ़) में विधानसभा चुनाव की आहट और गर्माहट दोनों ही तेज हो चली है। आने वाले चुनाव को देखते हुए ही राजनीतिक दल कमर कस रहे हैं। वही चुनावी बिसात बिछाने की तैयारी भी पाइप लाइन में है। सबसे बड़ा सवाल और प्रतिष्ठा का विषय किसी राजनीतिक पार्टी से टिकट मिलना और उसका पक्का होना है। हालांकि टिकट देने को लेकर गलत फैसले व पार्टियों को मिले जोरदार झटको का गुजरा इतिहास किसी से छिपा नही है। राजनीति में जाहिर है कि नफा नुकसान का अंदाजा लगाने के साथ चुनाव परिणाम बदल देने वाले चेहरों को महत्व मिलना चाहिए पर अब चुनाव को लेकर पार्टियों के फैसले सबसे नाजुक स्थिति में होते हैं। एन वक़्त हालात क्या करवट ले लें, कुछ नहीं कहा जा सकता। नतीजा यह कि इस फेरबदल के चक्कर में जमीनी व मतदाता से जुड़ाव रखने वाले चेहरे भी गच्चा खा जाते हैं। विधानसभा चुनाव क्या गुल खिलाएगा, कितने और कौन से चेहरों की रंगत उतरेगी। यह आने वाला समय ही बताएगा। वैसे दावेदारी का खेल शुरू हो गया है और चित व पट के दांव भी। 

तो आइए एक नजर डालते हैं विधानसभा वार दलीय स्थिति पर। शुरुआत करते हैं विधानसभा क्षेत्र नवाबगंज से और बात करते हैं समाजवादी पार्टी की। याद दिला दें कि इस सीट पर समाजवादी पार्टी बीते दो दशक से भी अधिक समय से एक जाति यादव को ही बतौर प्रत्याशी उतारती आई है। वर्तमान समय में भी इस पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए दावेदारों की लाइन तैयार है। यहां पार्टी का दांव कभी असफल तो कभी फेल साबित हुआ लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं की हार या जीत दोनों ही स्थिति में यादव बिरादरी के साथ ही अल्पसंख्यक समाज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नवाबगंज क्षेत्र में समाजवाद का परचम लहराने के पीछे अल्पसंख्यक समाज का इस पार्टी के प्रति अटूट भरोसा रहा है। लेकिन वक्त के साथ राजनीति और रंग ढंग भी बदले हैं। चर्चा ही नहीं बल्कि इसकी जरूरत महसूस की जा रही, कि इस क्षेत्र से यादव बिरादरी का चयन फिलहाल रोक कर अल्पसंख्यक समाज से किसी चेहरे को दावेदार बनाया जाए। शायद यह गलत भी ना होगा। जिस सीट पर यादव और अल्पसंख्यक मिलकर ही किसी प्रत्याशी के भाग्य का फैसला कर दें। वहां पर एक नया प्रयोग करना गलत ना होगा। हालांकि इस पर फैसला पार्टी का नेतृत्व करेगा लेकिन बड़ी भूमिका स्थानीय संगठन द्वारा पेश की जाने वाली तस्वीर पर निर्भर होगा। यह सही है कि यादव बिरादरी का प्रत्याशी बराबर चुनाव जीतता आ रहा, लेकिन इस जीत के पीछे तिकड़म, राजनीतिक दांव पेंच तथा परिस्थितियां बहुत अहम रही हैं। आने वाला समय और अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है। यह कहना गलत ना होगा कि पसंद नापसंद का भी ख्याल नेतृत्व को रखना चाहिए। मतदाता की कसौटी पर खरा उतरना एक जनप्रतिनिधि के लिए जरूरी हो जाता है।