खुद अंधेरे में रहकर बाकी जिले की रोशनी देखते रह गए बाढ़ पीड़ित

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खुद अंधेरे में रहकर बाकी जिले की रोशनी देखते रह गए बाढ़ पीड़ित

अवधनामा संवाददाता

बाराबंकी। गत 22 अक्टूबर को उड़नखटोले से बाराबंकी के बाढ़ग्रस्त इलाका देखने के बाद जलशक्ति मंत्री डॉ महेंद्र सिंह जितने निर्देश दे गए, उनका अनुपालन हुआ या नही, यह तो सरकारी कागज ही बताएंगे पर बाढ़पीड़ित खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। घर गृहस्थी, खेती बाड़ी तो चौपट हुई ही, दीपावली जैसा त्योहार बिना दिया जलाए ही निपट गया। एक बुजुर्ग ने कहा कि साहब, मंत्री होर घूमै फिरै आवत हवै, उनके जावै के बाद तौ अधिकारिव मुंह फेर लिहिन। यहै हम लोगन का नसीब आये। बुजुर्ग की बातों में जो दर्द था, उसे बयाँ करना मुश्किल है। वास्तव में पूरा जिला, मंत्री, नेता अफसर जब दीपावली की जगमगाहट का लुत्फ उठा रहे थे, तब 69 गांवों की 27 हजार की आबादी अंधेरे को कोस रही थी। है न विडम्बना।

आपको याद दिलाते चलें कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर जलशक्ति मंत्री डॉ महेंद्र सिंह ने गत 22 अक्टूबर को बाराबंकी जिले के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हवाई सर्वेक्षण कर स्थिति का जायजा लिया। पुलिस लाइन सभागार में अफसरों के साथ समीक्षा कर बाढ़ के हालात और मुआवजा को लेकर बातचीत की और आवश्यक दिशा निर्देश दिए।  पुलिस लाइन सभागार में लगभग एक घंटा तक अधिकारियों के साथ बैठक कर उन्होंने जिले के बाढ़ के हालातों और बचाव कार्यों की समीक्षा की, हवाई सर्वेक्षण के बाद जलशक्ति मंत्री ने अधिकारियों को अलर्ट रहने के साथ ही बाढ़ पीड़ितों को राहत सामग्री बांटने के निर्देश दिए। उनसे ही जानकारी मिली कि बनबसा बैराज से पांच लाख 47 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया। नेपाल की तरफ से भी चार लाख 91 हजार क्यूसेक पानी सरयू नदी में छोड़ा गया है। बाराबंकी जिले में 69 ग्राम पंचायतें और 26 हजार लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने बताया कि बाराबंकी जिले में कोई भी जनहानि नहीं हुई है। इसके अलावा जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि सभी बाढ़ प्रभावितों की हरसंभव मदद की जाए। लोगों के लिए शुद्ध पेय जल और राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। उन्होंने बताया कि हर बाढ़ प्रभावित ग्राम पंचायत के लिए नोडल अधिकारी नामित किया गया है, जो वहां को समस्या को देखकर उसके हल की कार्ययोजना बनाएंगे। 

मंत्री के जाते ही बाढ़ग्रस्त इलाकों की ओर जाते वाहनों की गति थम गई, अफसर अन्य कामो में जुट गए या यूं कह लें कि सरकारी लंबित काम मे जुटना जरूरी हो गया। यही वजह थी शायद कि मदद की आस में प्रभावित इलाकों से लेकर तटबंध पर जमा पीड़ित जमे रह गए पर न उस ओर कोई जनप्रतिनिधि गया और न ही अफसर। नोडल अधिकारी किसे बनाया गया, उनकी क्या भूमिका रही, क्या काम किया इसकी जानकारी भला कौन दे। पीड़ित मुआवजे से लेकर मदद को तरस गए, जानवर चारे की आस में कई दिनों तक भूंखे ही रह गए, बाढ का गंदा जहरीले जीव जंतुओं से भरा पानी पीड़ितों को अब तक सता रहा। दीपावली जैसा अहम त्योहार कब गुजर गया, पता ही न चला। बस पीड़ित जिले के बाकी हिस्से में फैली जगमगाहट तकते रह गए।