सम्भावित तस्वीर: कमल व साइकिल लड़ेंगे विधानसभा चुनाव, बाकी होंगे मूकदर्शक

 बसपा खेलती मुस्लिम उम्मीदवार कार्ड तो कुछ और होती तसवीर

 | 
सम्भावित तस्वीर: कमल व साइकिल लड़ेंगे विधानसभा चुनाव, बाकी होंगे मूकदर्शक

अवधनामा संवाददाता (आदिल तन्हा)

बाराबंकी। विधानसभा सदर सीट का ताज आसन्न चुनाव में किसके माथे सजेगा, इसकी चर्चा अब होने लगी है। बतौर उम्मीदवार समाजवादी पार्टी से वर्तमान विधायक ने अपने प्रतिद्वंद्वी से दो दो हाथ करने के लिए कमर कस ली है, वहीं सत्ताधारी दल में जिताऊ उम्मीदवार उतारने पर मंथन चल रहा है। माना जाता है कि दावेदारी की लंबी फेहरिस्त में से समय रहते लायक प्रत्याशी तलाश लिया जाएगा। आम चर्चा पर ही गौर करें तो हमेशा की तरह दो दलों के बीच ही मुक़ाबला सिमट कर रह जाएगा। फिर शेष की बात ही कौन करे। 

धीमी गति से ही सही पर विधानसभा चुनाव की चर्चा गांव गलियारों में होने लगी है। हो भी क्यों न, आखिर इस चुनाव का परिणाम ही तो यूपी का अगला चेहरा तय करता है। वो तो सबसे बड़े पर्व दीपावली को धूमधाम से मनाने के लिए हरेक अत्यधिक व्यस्त है वरना यही चुनाव, समीकरण और प्रत्याशियों के नामों की चर्चा परवान चढ़ गई होती। 

एक नजर डाली जाए जिले की सीटों पर तो सर्वाधिक चर्चा का विषय बाराबंकी सदर यानी नवाबगंज सीट है। जहां सत्ताधारी दल के उम्मीदवार को हरा कर समाजवादी उम्मीदवार ने जीत का झंडा बुलंद किया था। केन्द्र व राज्य में सरकार होने के बाद भी प्रत्याशी का चुनाव हार जाना पार्टी स्तर पर मंथन का विषय बन गया था, जबकि भाजपा उम्मीदवार को जिताने के लिए मतदाता ने पूरी ताकत लगा दी थी, वहीं भाजपा की लहर तो चल ही रही थी। इस सीट की वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो समाजवादी पार्टी से खुद को उम्मीदवार मानते हुए सदर विधायक धर्मराज उर्फ सुरेश यादव ने दौड़भाग तेज कर दी है। वोटों की गणित बिठाने के लिए वह निरन्तर जुटे हुए हैं, वहीं नाराज मतदाता को मनाने के लिए सारी कवायद की जा रही है। सत्ताधारी दल के खेमे में अभी उम्मीदवार पर कोई फैसला नही हो सका है। दावेदारी की फेहरिस्त काफी लंबी है और सभी अपना अपना दांव चल रहे। इनमे कौन आगे निकलेगा, यह कहना अभी जल्दबाजी ही होगी लेकिन विचार विमर्श तेजी पर है। रही बात इस सीट पर होने वाले मुकाबले की तो सपा और भाजपा के मध्य ही लड़ाई सिमट कर रह जाएगी। यह जरूर है कि अगर बसपा ने कोई मुस्लिम उम्मीदवार उतारा होता तो पार्टी लड़ाई में आ जाती। राजनीतिक जानकारों की माने तो सपा भाजपा के अलावा अन्य दल जैसे कि बसपा व कांग्रेस उम्मीदवार महज उपस्थिति ही दर्ज कराएंगे, सम्भव है कि जमानत बचाना मुश्किल हो जाये। इस सीट का जातीय समीकरण ही कुछ ऐसा है और बीते कुछ चुनावों के परिणाम देख कर यही प्रतीत हो रहा। वैसे भी बसपा उम्मीदवार का नाम केवल जुबान पर ही है, वह दिमाग तक पहुंचने में सफल नही हो पा रहे। लोग कह रहे कि उनके पास धनबल जरूर है लेकिन आम जनमानस में पैठ नही। कही ऐसा न हो कि पार्टी नेतृत्व को अपने फैसले को लेकर पछताना पड़े वह भी बाद चुनाव।