कानून को सामाजिक व आर्थिक प्रगति व बदलाव के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए- राष्ट्रपति

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कानून को सामाजिक व आर्थिक प्रगति व बदलाव के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए- राष्ट्रपति
अवधनामा संवाददाता 

प्रयागराज (prayagraj)। महामहिम राष्ट्रपति  रामनाथ कोविंद शनिवार को मा0 उच्च न्यायालय इलाहाबाद परिसर में आयोजित कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय प्रयागराज तथा रूपये 640.37 करोड़ की धनराशि से निर्मित होने वाले एडवोकेट चेम्बर व मल्टीलेवल पार्किंग का शिलान्यास करते हुए दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता स्व0  आनंद भूषण के चित्र का अनावरण किया गया। कार्यक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्थापना एवं उसके गौरवशाली इतिहास के बारे में प्रस्तुतीकरण किया गया।
इस अवसर पर उपस्थित लोगो को सम्बोधित करते हुए महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय प्रयागराज एवं एडवोकेट चेम्बर व मल्टी लेवल पार्किंग का शिलान्यास करते हुए मुझे अत्यंत गौरवान्वित एवं प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। उन्होंने कहा कि सचमुच में यह दोनों ही कार्य न्याय प्रदान करने संबंधी व्यवस्था में सराहनीय प्रयास है। उन्होंने कहा कि विधि शिक्षण और न्याय प्रणाली में व्यापक सुधारों के लिए भारत की न्यायपालिका तथा केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा मिलकर निरंतर प्रयास किये जा रहे है। इन प्रयासों के लिए केन्द्र और राज्यों के स्तर पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की ओर से सहयोग करने वाले सभी लोग प्रशंसा के पात्र है। इतिहास की दृष्टि से इलाहाबाद हाईकोर्ट, भारत में स्थापित किया गया चैथा हाईकोर्ट है। महत्व की दृष्टि से यह हाईकोर्ट देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में न्याय प्रदान करने की जिम्मेदारी निभाता है। न्यायधीशों की संख्या की दृष्टि से यह देश का सबसे बड़ा हाईकोर्ट है, परंतु इन सभी तथ्यों से अधिक महत्वपूर्ण है, इलाहाबाद हाईकोर्ट की परंम्परा, जिसमें मदन मोहन मालवीय, मोती लाल नेहरू, तेज बहादुर सपू्र, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन एवं कैलाष नाथ काटजू जैसे प्रखर व राष्ट्रप्रेमी अधिवक्ताओं ने इसी परिसर में भारतीय इतिहास के अनेक गौरवशाली इतिहास लिखे है। इस हाईकोर्ट के बेंच व बार के प्रबुद्ध सदस्यों ने समाज व देश को वैचारिक नेतृत्व भी प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि इसी उच्च न्यायालय में सन् 1921 में भारत की पहली महिला वकील सुश्री काॅर्नेलिया सोराबजी को पंजीकृत करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया था, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का भविष्य उन्मूखी निर्णय था। उन्होंने कहा कि हम सभी जानते है, पिछले महीने न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी कर इतिहास रचा गया। उन्होंने तीन महिला न्यायाधीशों सहित नौ न्यायधीशों की नियुक्ति की स्वीकृति प्रदान किया था। आज उच्चतम न्यायालय में नियुक्त कुल 33 न्यायधीशों में 4 महिला न्यायधीशों की उपस्थिति न्यायपालिका के इतिहास में आज तक की अधिकतम संख्या है। उन्होंने कहा सामान्तयः महिलाओं में न्याय प्रकृति का अंश अधिक होता है, भले ही कुछ इसके अपवाद होते हो। हर किसी को न्याय देने की प्रवृत्ति मानसिकता व संस्कार होते है। मायका हो, ससुराल हो, पति हो, संतान हो, कामकाजी महिलायें सबके बीच संतुलन बनाते हुए भी अपने कार्य क्षेत्र में उत्कृष्टता का उदाहरण प्रस्तुत करती है। सही मायने में न्यायपूर्ण समाज की स्थापना तभी सम्भव होगी, जब अन्य क्षेत्रों सहित देश की न्याय व्यवस्था में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि आज उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को मिलाकर महिला न्यायधीशों की कुल संख्या 12 प्रतिशत से भी कम है। उन्होंने कहा कि यदि हमें अपने संविधान के समावेशी आदर्शों को प्राप्त करना है, तो न्यायपालिका में भी महिलाओं की भूमिका को बढ़ाना ही होगा। उन्होंने कहा कि उन्हें आशा है कि देश के इस विशालतम उच्च न्यायलय में महिला अधिवक्ताओं, अधिकारियों व न्यायधीशों की संख्या में वृद्धि होगी।
राष्ट्रपति जी ने कहा कि एक अधिवक्ता के रूप में उन्होंने देखा है कि एक युवा, सामान्य परिवार के अधिवक्ता, उनके सहायक एवं वादकारी न्यूनतम सुविधाओं के अभाव के कारण अत्यंत कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। इस सम्बंध में आज इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जिन कार्यों का शुभारम्भ किया गया है, वह अधिवक्ताओं व उनके सहायकों तथा वादकारियों के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध होगी। उन्होंने कहा कि यह उनका सौभाग्य है उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका से जुड़कर कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। न्याय पाने के लिए गरीब के संघर्ष को उन्होंने नजदीक से देखा है। न्यायपालिका से सभी को उम्मीदें तो होती है, फिर भी सामान्यतः लोग न्यायपालिका की सहायता लेने से हिचकिचाते है। न्यायपालिका के प्रति लोगो के विश्वास को और अधिक बढ़ाने के लिए इस स्थिति को बदलना जरूरी है। हम सभी को समय से न्याय मिले, न्याय व्यवस्था कम खर्चीली हो, सामान्य आदमी की समझ में आने वाली भाषा में निर्णय देने की व्यवस्था हो और विशेषकर महिलाओं तथा कमजोर वर्ग के लोगो को न्याय मिले, यह हम सब की जिम्मेदारी है, यह सम्भव तभी होगा, जब न्याय व्यवस्था से जुड़े स्टेक होल्डर अपनी सोच व कार्य संस्कृति में आवश्यक बदलाव लायेंगे और संवेदनशील भी बनेंगे।
 राष्ट्रपति जी ने कहा कि विधि के समक्ष समता प्रदान करने वाले अनुच्छेद 14 तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने अनुच्छेद 21 के तहत सभी नागरिकों को यह मूलभूत अधिकार है कि न्याय उनके पहुंच मेें हो, यह मूल अधिकार सुनिश्चित कराना सरकार के सभी अंगों विशेषकर न्यायपालिका की सफलता की कसौटी है। जनसाधारण में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और उत्साह को बढ़ाने के लिए लम्बित मामलों के निस्तारण में तेजी लाने से लेकर अधीनस्थ न्यायालयों की दक्षता बढ़ाने से लेकर कई पहलुओं पर अनवरत प्रयासरत रहना समय की मांग है। अधीनस्थ न्यायलयों के लिए पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था कराने, जजों की नियुक्ति कर जजों की संख्या में समुचित वृद्धि करने तथा बजट के प्रावधानों के अनुरूप पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने से हमार न्याय प्रक्रिया को और मजबूत आधार मिलेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें पूर्ण विश्वास है कि देश का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय राज्य सरकार के सहयोग से ऐसे सभी क्षेत्रों में अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
 राष्ट्रपति जी ने कहा कि प्रयागराज की एक प्रमुख पहचान शिक्षा के केन्द्र के रूप में रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका तथा शिक्षा के केन्द्र के रूप में प्रयागराज की प्रतिष्ठा को देखते हुए इस विधि विश्वविद्यालय के लिए प्रयागराज ही सर्वोत्तम स्थान चुना गया। विधि विश्वविद्यालय हेतु जमीन चिन्हित कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश तथा उनकी पूरी टीम की सराहना की। राज्यपाल जी के मार्गदर्शन तथा मुख्यमंत्री जी के सक्रिय निर्देशन में हो रही प्रगति के लिए उन्हें और उनकी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि कानून का शासन पर आधारित व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। विश्वस्तरीय विधि शिक्षा हमारे समाज की प्राथमिकताओं में से एक है। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में कक्षा 12 के बाद ही हमारे युवा दाखिले लेते है, जैसा की इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों में पहले से ही होता रहा है, ऐसे बच्चे स्कूल स्तर से ही कानून के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने के लिए प्रोत्साहित होते है, ऐसे उत्साहित विद्यार्थिंयों में विधि जगत में अपनी अच्छी साख बनायी है, परंतु यह आवश्यक है कि शिक्षण के सभी संस्थानों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण पर जोर दिया जाये। किसी भी संस्थान के लिए आरम्भ में ही सुविचारित रूप से स्थापित करना सरल होता है, व्यवस्था के निर्मित हो जाने के बाद इसमें सुधार करने की प्रक्रिया जटिल होती जाती है, इसलिए इस विश्वविद्यालय की स्थापना से ही सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय की पद्धतियों और प्रणालियों का अध्ययन कर श्रेष्ठतम व्यवस्थाओं को अपनाया जाये। इस विश्वविद्यालय में शुरू से ही छात्राओं और शिक्षिकाओं के समान प्रतिनिधित्व पर जोर दिया जाना चाहिए। आधुनिक सुविधाओं के निर्माण, विद्यार्थियों का चयन, अध्यापकों की नियुक्ति, पाठ्यक्रम का निर्धारण आदि सभी आयामों में विश्व के श्रेष्ठतम पद्धतियों को कार्यान्वित करके विश्व स्तरीय संस्थान का निर्माण करना चाहिए। कानून को सामाजिक व आर्थिक प्रगति व बदलाव के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इनक कार्यों का शुभारम्भ आज एक ऐसे दिवस पर हो रहा है, जिसपर हर एक भारत वासियों को गौरान्वित होना चाहिए। आज ही के दिन 128 वर्ष पहले शिकांगों में स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म महासभा में अपने ऐतिहासिक सम्बोधन में भारत के गौरव का उद्घोष किया था, उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने चरम उत्कर्ष पर था, लेकिन स्वामी जी के सम्बोधन से पूरा विश्व समुदाय भारत के आध्यात्मिक शक्ति के प्रति सम्मान से भर उठा। स्वामी जी हर प्रकार की धर्मांधता और उत्पीड़न के समापन की आशा व्यक्त करते हुए भारत के न्याय, समानता व करूणा पर आधारित संस्कृति तथा संहिष्णुता का संदेश पूरी मानवता तक पहुंचाया था। यदि विश्व समुदाय ने 1893 में स्वामी विवेकानंद के संहिष्णुता के संदेश को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया होता तो शायद अमेरिका में 11 सितम्बर, 2000 का मानवता विरोधी भीषण अपराध न हुआ होता । देश की युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानंद के आदर्शों पर चलकर 21वीं सदी में देश को गौरान्वित करेंगी, इसमें न्याय प्रणाली को भी अपनी महती भूमिका निभानी होगी।