माशूक ए खुदा बनना चाहते हो तो आशिक ए हुसैन बनो -मौलाना वसी हसन खान

हुसैन हिदायत का चराग़ व नज़ात का ज़रीया है

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माशूक ए खुदा बनना चाहते हो तो आशिक ए हुसैन बनो -मौलाना वसी हसन खान

इमामत का ओहदा ज़ालमीन तक नहीं पहुंच सकता , ये फ़रमाने ख़ुदा है

अवधनामा संवाददाता 

बाराबंकी (Barabanki) । अगर सारी दुनियां अपना सब कुछ नामे हुसैन पर लुटा दे तब भी अज्रे हुसैन अदा नहीं हो सकता।क्योंकि हुसैन राहे हक़ में क़ुरबानी न देते तो इंसानियत मर गई होती दीन फ़ना हो गया होता।अगर साथ बहन ज़ैनब को न लाते तो कुरबानिये हुसैन बेमाना हो जाती ,दुश्मन की चाल कामयाब हो जाती । बादे हुसैन मक़्सदे हुसैन को आगे बढ़ाया इमामत को पहचनवा कर ज़ालिमों को बे नक़ाब किया ज़ैनब ने। इमामत का ओहदा ज़ालमीन तक नहीं पहुंच सकता , ये फ़रमाने ख़ुदा है । यह बात मौलाना गुलाम अस्करी हाल में जनाब अहमद रज़ा द्वारा आयोजित अशरे की छठीं मजलिस को ख़िताब करते हुए आली जनाब मौलाना वसी हसन खान साहब ने  कही । मौलाना ने यह भी कहा कि हिदायत की रौशनी व नजात का ज़रीया चाहिए तो दरे हुसैन आना होगा । क्योंकि हुसैन ही हिदायत का चराग़ व नज़ात का ज़रीया हैं । मौलाना ने ये भी कहा कि माशूक ए खुदा बनना चाहते हो तो आशिक ए हुसैन बनो । खुदा उसे ही पसन्द करता है जो हुसैन से इश्क़ करता है ।

 मेहदी नक़वी ने पढ़ा - आंसुओं को जब ग़में शह का वज़ीफ़ा मिल गया , तब मेरी चश्मे बशीरत को उजाला मिल गया । हाजी सरवर अली कर्बलाई ने पढ़ा - मेरे अश्कों ने ज़माने में ये रूतबा पाया , चश्म से बहने को सरवर का वसीला पाया , हम  ने  जब देखा   तुझे और  जियालों  को  तेरे , तब  से  ऐ   कर्बला   जीने  का  सलीका   पाया । मोनिस सरवर , ग़ाज़ी इमाम  ने भी नज़रानये अक़ीदत पेश की ।मजलिस का आग़ाज़ तिलावत ए कलाम ए इलाही से मो० रजा़ जै़दी ने किया । अन्जुमन गुन्चये अब्बासिया ने नौहा खानी व सीनाज़नी की । बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया।