सहारनपुर से जुड़ा है ऐतिहासिक काकोरी काण्ड

स्टेशन के बाहर काकोरी स्मारक बनाने का सुझाव
 
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सहारनपुर से जुड़ा है ऐतिहासिक काकोरी काण्ड 

अवधनामा संवाददाता 

सहारनपुर। स्वाधीनता संग्राम के यज्ञ में दे गई आहुतियों की श्रंखला में देश दीवानों को हुई पहली सामूहिक फांसी का स्मृति दिवस आज मोक्षायतन अंतर्राष्ट्रीय योगाश्रम के पतंजलि सभागार में नेशन बिल्डर्स एकेडमी व राष्ट्र वंदना मिशन ने संयुक्त रूप से मनाया। इस दिन देश को आतंकित करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लहड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को एकसाथ अलग अलग जेलों में फांसी दी गई थी।
मोक्षायतन योग संस्थान में उनकी पुण्य स्मृति में हुए यज्ञ से उन्हे श्रद्धानत नमन और परिचर्चा से उन हुतात्माओं को स्मरण किया गया। राष्ट्र वंदना प्रकल्प के संयोजक और देश का पहला व एकमात्र राष्ट्रवंदना भवन बनवाने वाले पूर्व पुलिस उपाधीक्षक विद्यार्णव शर्मा ने अपने संबोधन में काकोरी काण्ड के इतिहास से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि 1857 की क्रांति में आशानुरूप सफलता न मिलने के कारण देश में लंबे समय तक क्रांतिकारी गतिविधियों की गति धीमी अवश्य पड़ी, परन्तु क्रांतिकारी संगठन देश को आज़ाद कराने के दायित्व से विमुख नहीं हुए। नौ अगस्त 1925  की अर्धरात्रि में आज़ादी के इन दीवानों ने स्वतंत्रता संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिये धन की आवश्यकता पूरी करने के लिये सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली 1० डाउन पैसेंजर ट्रेन से सरकारी खजाना लूट लिया। जोखिम भरी इस घटना को अंजाम देने में चन्द्र शेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिहं, राजेन्द्र लाहिड़ी,शचीन्द्र नाथ बख़्शी, गोविंद चरण कर,मन्मथनाथ गुप्त,रामकृष्ण खत्री आदि क्रांतिकारी शामिल रहे। इस केस में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां ,ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी की सज़ा सुनाई गई, शेष क्रांतिकारियों को लंबे कारावास दिये गये। ये क्रांतिकारी बहुत साहसी थे। अशफ़ाक उल्ला खां के वकील कृपा शंकर हजेला अंतिम बार 17 दिसंबर 1927 को उनसे मिलने फैज़ाबाद जेल गये। अशफ़ाक उल्ला ने उन्हें कहा हजेला साहब परसों 19 दिसंबर को मुझे फाँसी होगी, मैं चाहता हूँ आप फांसी के दिन मेरे सामने खड़े होकर देखते जाइये मैं किस ख़ुशी से फाँसी पर चढ़ता हूँ। ये सुनकर उनके वकील हजेला की आँखों में आँसू आगये। उन्होंने कहा कि मुझमें ये नज़ारा देखने की हिम्मत नहीं है, मगर तुम्हारे मजार पर फूल चढ़ाने जरूर आऊँगा। ठाकुर रोशन सिंह ने अपने पत्र में लिखा, हमारे शास्त्रों में लिखा है कि धर्मयुद्ध में मरने वालों की वही गति होती है जो तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों की होती है। फाँसी से पूर्व राजेंद्र लाहिड़ी ने कहा कि देश की बलिवेदी पर मेरे प्राणों की आवश्यकता है, मेरी मौत व्यर्थ नहीं जाएगी। डरी हुई अंग्रेज सरकार ने राजेन्द्र लाहिड़ी को तो निश्चित तिथि से पूर्व ही 17 दिसम्बर 1927 को गोंडा जेल में फाँसी पर लटका दिया। इस अवसर पर मौजूद योग गुरु पद्मश्री स्वामी भारत भूषण ने कहा कि ये स्मृति दिवस नई पीढ़ी को उन अमर बलिदानों जानकारी देते हैं जो आजादी के लिए दिए गए। उन्होंने कहा कि हम भले ही आजादी के लिए प्राण उत्सर्ग करने वालों में न रहे हो लेकिन उस आजादी की जिम्मेदारी से रक्षा करने वालों में तो शामिल होने का गौरव तो प्राप्त कर ही सकते हैं। उन्होंने सहारनपुर स्टेशन के बाहर काकोरी स्मारक बनाने का सुझाव दिया, क्योंकि ये ऐतिहासिक घटना सहारनपुर से जुड़ी है। काकोरी काण्ड और लाहौर असेंबली कांड के महानायक पंडित चंद्र शेखर आजाद के पौत्र अमित आजाद ने भी आज मोक्षायतन योगाश्रम पहुंचकर योगगुरु का आशीर्वाद लिया।कार्यक्रम में निवर्तमान सचिव ऋषि पाल सिंह, डीके बंसल, नंद किशोर शर्मा, स.जरनैल सिंह, विशाल गुलाटी, डॉ अशोक गुप्ता, पवन सिंघानिया, ललित वर्मा, सुभाष वर्मा, राजन टोंक, विजय सुखीजा, राजू लूथरा, योगाचार्य अनीता शर्मा व मंजू गुप्ता, अजय यादव, पवन सेठी, रॉक्सी सिंह, अमरनाथ इंजीनियर, सुभाष वर्मा, मोहित ढल आदि मुख्य रूप से मौजूद रहे।