बेबश पिता की पुकार : भगवान मेरे बेटे को बचा लें या हमें उठा ले

चौबीस घंटे आक्सीजन के सहारे जिन्दगी और मौत से जूझ रहा है अंकुर

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बेबश पिता की पुकार : भगवान मेरे बेटे को बचा लें या हमें उठा ले

अवधनामा संवाददाता (शकील अहमद)

कुशीनगर। उसकी सास की डोर बेशक ऊपर वाले के हाथो मे है लेकिन उसकी धडकन मशीन के सहारे चल रही है। वह चौबीस घंटा आक्सीजन के सहारे बिस्तर पर अपनी मौत की दुआ मांग रहा है। वह अपने पिता और दादी की बेबसी और लाचारी देख उनके सामने अपना असहनीय दर्द छुपाकर होठो पर मुस्कान लाने का प्रयास कर रहा है लेकिन उसके बनावटी मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को पिता और दादी बखूबी महसूस करते है। तभी तो वह कहते हे भगवान मेरे बैटे को बचा लो या हमे ऊपर उठा लो। 

मजह 35 बसंत देखने वाला अंकुर श्रीवास्तव जिन्दगी और मौत से जूझ रहा है। गरीबी और लाचारी की मार झेल रहे पडरौना नगर के साहबगंज मुहल्ले के निवासी राकेश श्रीवास्तव के इकलौता बुढापे की लाठी अंकुर श्वास रोग (अस्थमा) से ग्रसित है उसका फेफडा पुरी तरह से खराब हो गया है। एम्स और मेदातां के चिकित्सकों के मुताबिक दो माह के भीतर अगर अंकुर के फेफड़ों का ट्रांसप्लांट नही हुआ तो उसे बचाया नही जा सकता। इसके लिए तकरीबन 60 लाख रुपये का खर्च होगा। अपने बुढापे की लाठी के सहारे सुन्दर भविष्य की सपना देखने वाले पिता राकेश के उस समय पैर तले जमीन खिसक गयी जब उन्हे तीन माह पूर्व अपने लख्ते जिगर अंकुर की बीमारी की जानकारी हुई। वह काप उठे मानो उनकी दुनिया ही उजड गयी क्योंकि अट्ठारह वर्ष पूर्व इसी बीमारी ने असमय उनकी पत्नी को उनसे छिन लिया था। एक निजी कंपनी मे जीवन बीमा एजेंट के रूप मे कार्य करने वाले राकेश श्रीवास्तव अपने जिगर के टुकड़े की जिन्दगी बचाने के लिए अपने जिन्दगी भर की कमाई इकट्ठा कर अक्टूबर माह मे बेटे को लेकर मेदांता हॉस्पिटल दिल्ली गये। यहां लाखो रुपये खर्च करने के बाद बेटे के बीमारी मे कोई सुधार नही हुआ तो फिर राष्ट्रीय क्षय एवं श्वास रोग संस्थान और एम्स मे महीनो भर्ती कराकर अपने बेटे का इलाज कराया। पानी की तरह पैसा खर्च करने के बावजूद यहा भी अंकुर के स्वास्थ्य मे कोई विशेष सुधार नही हुआ। फिर भी यह पिता हार नही माना वह अपने सगे- संबंधियों से कर्ज लेकर बेटे का इलाज कराते रहे, जब वह पुरी तरह से कंगाल हो गये तो चिकित्सकों ने यह कहकर उन्हे घर वापस भेज दिया कि दो माह के भीतर अगर  हैदराबाद में अंकुर के फेफड़े का ट्रांसप्लांट नही हुआ तो उसे बचाया नही जा सकता इसके लिए लगभग 60 लाख रुपये खर्च लगेगा। पिता राकेश बिलखते हुए कहते है हर बाप की इच्छा होती है कि बेटे के कंधे पर उसकी अर्थी उठे लेकिन मै दुनिया का सबसे बदनसीब बाप हू जो अपने इस बूढे कंधे पर अपने बेटे की अर्थी उठाने का इंतजार कर रहा हू। तभी नब्बे वर्षीय बूढी दादी सुभावती देवी बोल पडती है भगवान हमके उठा ले हमरे बाबू के जिन्दगी बचा ले। 

बीमार बेटे और बूढी मां के साथ रहते है किराये के मकान मे

नगरपालिका पडरौना क्षेत्र के साहबगंज मोहल्ले के रहने वाले राकेश श्रीवास्तव मूलतः गोरखपुर जिले के सहजनवा पाली के रहने वाले है। चूकि उनके चाचा कुशीनगर जनपद के कठकुइया चीनी मिल कार्यरत थे तो राकेश उन्ही के साथ पडरौना आ गये। यही उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। शादी के बाद पडरौना में एक किराए के मकान में 40 वर्षो से रह रहे है। अट्ठारह वर्ष पूर्व पत्नी संजीता श्रीवास्तव श्वास रोग से ग्रसित होकर एक बेटा और एक बेटी राकेश को सुपुर्द करके उन्हे बीच मझधार मे छोडकर भगवान को प्यारी हो गयी। जिन्दगी के लिए संघर्ष कर रहा अंकुर अहमदाबाद से ग्राफिक्स डिजाइनिंग की पढ़ाई कर रहा था जहा बीते अक्टूबर से ही उसकी तबियत खराब होने के कारण चौबीस घंटे आक्सीजन के साहारे बिस्तर पर तिल-तिल की जिन्दगी काट रहा है। अंकुर का कहना है कि जैसे जैसे समय बीत रहा मेरी पीड़ा बढ़ती जा रही। अपने पिता और दादी का जब मुझे सहारा बनना चाहिए तब मैं उन पर बोझ बन गया हूं। मेरे इलाज में अब भी पैसे खर्च हो रहे जो मेरे पिता कर्जे लेकर करा रहे फिर भी मैं उचित उपचार के अभाव में बच नही पाऊंगा।