भक्ति संगीत का रंगारंगकार्यक्रम के साथ शिवमय होगा वातावरण
वाराणसी। काशी में रंगभरी एकादशी का पर्व आज मनाया जाएगा। तैयारी पूर्ण हो चुकी है इस बीच श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत लोकपति तिवारी ने गोदौलिया बड़ादेव स्थित महंत निवास पर गुरुवार को एक पत्रकार वार्ता के दौरान बताया कि, इस वर्ष भी रंगभरी एकादशी महोत्सव का आयोजन श्री काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन द्वारा तय कर दिया गया है। जिसमें इस वर्ष भी यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि बाबा विश्वनाथ की प्राचीन रजत चल प्रतिमा को पूजन हेतु मंदिर प्रांगण में जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और यह स्पष्ट कर दिया गया है।
उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि, प्राचीन परम्परा के दिन जो तथाकथित रूप से बाबा की नई प्रतिमा टेढ़ीनीम पर बनाई गई है उसी से पालकी यात्रा निकाल कर उसका पूजन मंदिर गर्भगृह में किया जाएगा। उन्होंने कहा कि, जिले के सारे अधिकारियों से इस गंभीर प्रकरण को लेकर वार्ता की परन्तु सभी ने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारे ऊपर शासन सत्ता का बड़ा दबाव है,जिसकी वजह से हम सभी तथाकथित रुप से बनाई गई बाबा विश्वनाथ की नई प्रतिमा से परम्परा का निर्वहन करवाने को मजबूर हैं और हम बाबा की प्राचीन रजत चल प्रतिमा को मंदिर में मंगवा कर पूजन करवाने में असमर्थ है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मै मुख्यमंत्री जी से यह विनम्र निवेदन करना चाहता हूं कि काशी जैसी पौराणिक सांस्कृतिक धार्मिक नगरी में इस तरह के भ्रष्ट अधिकारियों को रहने का कोई भी अधिकार नहीं है जो अपनेकर्तव्य और दायित्वों के विपरीत काशी में होने वाली सारी लोक परंपराओं को संचालित करवा रहा है। उन्होंने मंदिर प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि, विश्वनाथ धाम में प्रत्येक दिवस मंदिर में आने वाले देश-विदेश से पर्यटकों के साथ अवैध वसूली मंदिर प्रशासन अपने कर्मचारियों से करवाता है।
मुझे लगता है की इसी प्रकार इस परंपरा को लेकर मंदिर प्रशासन को कोई विशेष लाभ का प्रस्ताव मिला होगा जिससे प्रशासन मजबूर होकर प्राचीन परंपरा में बाबा की प्राचीन प्रतिमा को मंदिर में प्रवेश हेतु रोक लगाकर बैठा है। उन्होंने काहा की मंदिर प्रशासन का यह कर्तव्य है कि वह परंपराओं का निर्वहन बाबा की प्राचीन रजत प्रतिमा से संपन्न करवाये, जिससे हम सभी काशी वासियों की आस्था जुड़ी है। पूर्व महंत ने मंडलायुक्त, मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं मंदिर के डिप्टी कलेक्टर से जवाब चाहता हूं कि अगर मंदिर में होने वाली परंपरा प्राचीन है तो उस परंपरा में शामिल होने वाली बाबा की प्राचीन मूल प्रतिमा कहां पर विराजित है ?





