17 अक्तूबर 1973 को अरब तेल उत्पादक देशों ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। इस कदम का मकसद साफ था। पश्चिमी देशों को इसरायल का समर्थन छोड़ने के लिए मजबूर करना था।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद अमेरिका ईरान के अंदर जमीनी ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है। इसमें ईरान के मुख्य कच्चे तेल निर्यात केंद्र खार्ग आइलैंड पर कब्जा या उसे ब्लॉक करना शामिल है, ताकि ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सके। साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट में कमर्शियल शिपिंग के लिए खतरा पैदा करने वाले हथियार सिस्टम और मिसाइल लॉन्च साइट्स को नष्ट करने के लिए तटीय इलाकों पर छापे मारने की योजना बनाई जा रही है।
ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट की ट्रांजिट लगभग रोक दी है। वह वहां से सिर्फ कुछ चुनिंदा जहाजों को गुजरने दे रहा है और रोजाना 2 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल के परिवहन को प्रभावित कर रहा है, जो दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग 20 प्रतिशत है। युद्ध शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 66 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर से भी ऊपर पहुंच गई है।
1973 के तेल प्रतिबंध के 50 साल से ज्यादा समय बाद, उस समय की घटना की तुलना आज के संकट से आसानी से की जा सकती है। मध्य पूर्व में 6 अक्तूबर 1973 को शुरू हुआ योम किप्पुर युद्ध सिर्फ एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि इसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया। मिस्र और सीरिया के इजरायल पर अचानक हमले से शुरू हुई इस जंग ने कुछ ही दिनों में वैश्विक राजनीति और तेल बाजार का रुख पूरी तरह बदल दिया।
क्यों हुई थी अरब-इजरायल युद्ध
इजरायली विमानों ने 1967 के युद्ध में मिस्र के कई हवाई अड्डों पर एक साथ आश्चर्यजनक हमला किया, जिसमें मिस्र के पायलट अपने विमानों तक पहुंचने से पहले ही अधिकतर मिग और अन्य लड़ाकू विमान हवाई पट्टियों पर ही नष्ट हो गए। थोड़ी देर बाद दूसरे हमले में इजरायली विमानों ने उन हवाई पट्टियों को भी पूरी तरह बेकार कर दिया, जिससे मिस्र की वायुसेना लगभग पूरी तरह से नष्ट हो गई और वह इस युद्ध में बुरी तरह हार गई।
लेकिन मिस्र और सीरिया अपने खोए हुए भू-भाग को वापस पाने के लिए बेचैन थे और उन्होंने बदला लेने के लिए 6 अक्तूबर 1973 का दिन चुना, जब उन्होंने योम किप्पुर युद्ध की शुरुआत हुई।
कैसे बदला अरब-इजरायल युद्ध का समीकरण
इजरायल को संयुक्त राज्य अमेरिका का खुला समर्थन मिला था, जिसके बाद, इजरायल ने मजबूत वापसी की और रिजर्व सेना को बुलाकर अमेरिकी हथियार के साथ लगातार हमले और रणनीति साथ युद्ध में बढ़त हासिल की। हार के डर से मिस्र ने जल्दी ही युद्ध विराम की अपील कर दी।
अमेरिका और सोवियत संघ के भारी दबाव में इजरायल को आगे बढ़ने से रोक दिया गया, जिससे युद्ध समाप्त हो गया। इस पूरे युद्ध में मिस्र और सीरिया के कुल 15,600 सैनिक मारे गए जबकि लगभग 35,000 सैनिक घायल हुए।
वहीं, इजरायल को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा, जिसमें कुल 2,569 सैनिक की मौत और 7,251 घायल हुए। हवाई युद्ध में अरब देशों के 440 युद्धक विमान नष्ट हो गए, जबकि इजरायल को मात्र 102 विमान खोने पड़े। यह युद्ध दोनों पक्षों के लिए बेहद खूनी और महंगी साबित हुआ। अरब देशों ने इसका कड़ा जवाब देने का फैसला किया। सऊदी अरब ने तेल को दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया।
17 अक्तूबर 1973 को अरब तेल उत्पादक देशों ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। इस कदम का मकसद साफ था। पश्चिमी देशों को इसरायल का समर्थन छोड़ने के लिए मजबूर करना था।
तेल की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल
तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगते ही वैश्विक बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई। कुछ ही महीनों में कच्चे तेल की कीमत लगभग चार गुना बढ़ गई। जहां जुलाई 1973 में तेल की कीमत करीब 2.80 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं दिसंबर तक यह 11.65 डॉलर के आसपास पहुंच गई।
इस अचानक बढ़ोतरी ने दुनिया भर में ईंधन संकट पैदा कर दिया। पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगने लगीं, कई देशों में ईंधन की सप्लाई सीमित कर दी गई और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगी।
इस संकट का सबसे गहरा असर अमेरिका और यूरोप के देशों पर पड़ा, जो सस्ते तेल पर अत्यधिक निर्भर थे। अमेरिका में उद्योगों की लागत बढ़ गई, बेरोजगारी में इजाफा हुआ और आर्थिक मंदी की स्थिति पैदा हो गई। यह पहली बार था जब विकसित देशों को ऊर्जा सुरक्षा के महत्व का एहसास हुआ। इसके बाद अमेरिका ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और रणनीतिक तेल भंडार बनाने जैसे कदम उठाने शुरू किए।
ओपेक की ताकत का उदय
इसके बाद पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन(OPEC) की ताकत दुनिया के सामने उभरकर आई। तेल उत्पादक देशों ने यह दिखा दिया कि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। पहले जहां तेल की कीमतों पर पश्चिमी कंपनियों का नियंत्रण था, वहीं अब यह नियंत्रण तेल उत्पादक देशों के हाथों में आ गया।
1973 का यह तेल संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। इससे स्टैगफ्लेशन जैसी नई आर्थिक समस्या सामने आई, जिसमें महंगाई बढ़ती है लेकिन आर्थिक विकास धीमा हो जाता है। कई देशों में विकास दर गिर गई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर पड़ा।





