असीम प्रसन्नता का विषय है कि हिन्दी भाषा, साहित्य सृजन के प्रति सजग, भारतीय संस्कृति के आस्थावान चिंतक श्री कन्हैया लाल की कुशल लेखनी से निसृत सद्य प्रकाशित “नर्मदा महाकाव्य “प्यार और अध्यात्म की ऐतिहासिक घटना पर लिखा गया पहला महाकाव्य है।
पौराणिक लोक कथा के अनुसार लोक कल्याण हेतु शिव जी ऋक्षवान पर्वत पर तप कर रहे थे, तब उनके मस्तक से पसीने की बूंदे गिरी और एक कन्या का जन्म हो गया।
दूसरे लोककथा के अनुसार ब्रह्मा जी तप कर रहे थे तब उनके दोनों आँखों से एक एक बूंद अश्रु गिरे। एक आंख के अश्रु से नर्मदा और दूसरे आंख के अश्रु से सोन का जन्म हुआ।
नर्मदा ने सोन के आकर्षक व्यक्तित्व के बारे मे सुना और सुनते सुनते सोन से प्यार हो गया। नर्मदा की सहेली जुहिला थी। नर्मदा जुहिला को अपनी सब बातें बताती थी। सोन की बहुत प्रशंसा सुन कर जुहिला के मन में भी सोन से प्यार हो गया। पत्र व्यवहार चला। जब राजा को पता चला तो उन्होने विवाह के लिए सोन के पिता से बात किया और वे राजी हो गये।
नर्मदा ने सोचा कि मैने तो सोन को देखा नही है, केवल सुनी सुनाई बातें है, हमें विवाह से पहले पता लगाना चाहिए। जुहिला बहुत ही विश्वास पात्र सहेली है तो नर्मदा ने उससे कहा कि तुम मेरे कपड़े पहन कर वहां चली जाओ। मेरा पत्र देकर उसे देखकर चली आना।
जुहिला मन ही मन सोन से प्यार करती थी, उसे तो अवसर मिल गया, प्यार जताने का। इस लिए वह चल पड़ी। महल के पास पहुंची तो वहीं एक बाग था। बाग मे ही सोन था उसने देखकर उसे बुला लिया। जुहिला गयी और देखते ही सोन ने उसे गले लगा लिया। प्यार वासना जताने लगा। जुहिला ने कहा कि वह नर्मदा नही है, पर उसने कुछ ध्यान नहीं दिया। वह लिपट चिपट कर प्यार जताने लगा।
इस तरह दोनों के लिप्त रहने पर बहुत देर हो गयी। नर्मदा को बहुत चिंता होने लगी। अधीर होकर वह चल पड़ी। वहां जाकर सोन और जुहिला को आपत्ति जनक स्थिति में देखा। नर्मदा को यह देखकर बहुत क्रोध आया। जुहिला को शाप दिया कि जब तक उसे नर्मदा का जल नहीं मिलेगा उसे मुक्ति नहीं मिलेगी। नर्मदा ने शपथ लिया कि वह आजीवन कुंवारी रहेगी, ऐसा कहकर वह वहां से नदी रुप में उल्टा बह चली। आगे पुस्तक पढ़ने मे बहुत आनंद प्राप्त होगा।





