ललितपुर। हमारी बचपन की सुखद कहानियों में गौरैया का नाम जरूर आता है। क्योंकि कहीं ना कहीं ये ही हमारे बचपन की सबसे पहली सखी होती थी। लेकिन आज खोजने पर भी हमारी वो सखी देखने को नहीं मिलती। इसलिए आज जरूरत है हमें इस प्रजाति को बचाने की। कहते हैं कि माह जनवरी से मई तक हमारी पक्षी गौरैया के प्रजनन का समय होता है। इसमें नर गौरैया मादा गौरैया को अपनी आवाज से शोर करके आकर्षित करते हैं। वे अपना एक घोंसला तैयार करते हैं और मादा गौरैया को अपना घोंसला दिखाने आते हैं। अगर मादा को ये पसंद आ जाता है तो इस घोसले में मादा गौरैया भी तिनके रख कर साथ में अपना घोंसला तैयार करती है। रिश्ते में हामि भरने का ये इनका अनोखा अंदाज होता है। आज के समय में ध्वनि प्रदूषण इतना अधिक हो गया है कि ये भी इनकी विलुप्ति एक बड़ा कारण है। इनके प्रजनन में ये भी बड़ा बाधक बन रहा है। आज की शोर शराबे की दुनिया में इनकी आवाज को मादा गौरैया तो क्या कोई सुन नहीं पा रहा। जिससे इनकी संख्या कम होती जा रही है। स्पैरो मैन ऑफ बुंदेलखंड के नाम से प्रसिद्ध युवा अधिवक्ता पर्यावरणविद्ध पुष्पेन्द्र सिंह चौहान बताते हैं कि वैसे तो गौरैया की संख्या का ऑडिट नहीं हुआ है लेकिन हमारे गौरैया रक्षकों द्वारा किए गए सर्वे में करीब 2000 गौरैयों को विभिन्न जगहों पर देखा गया था। अक्टूबर माह से ये गौरैया जोड़ा बनाने का काम शुरू कर देते हैं और एक साल में दो से छह अंडे देती है। आज के समय में शहरों में घोसले ना मिल पाना इनके प्रजनन में बाधक बन रहा है। इन्होने अपील की है कि कम से कम हम घर में एक बॉक्स लगाए जिसमें 32 एम.एम. का छेद हो ताकि उसमें ये अंडे दे सकें और साथ ही दाना पानी की भी व्यवस्था करे। गौरैया संरक्षण के साथ पर्यावरण के लिए कार्य कर रहे युवा समाजसेवी विकास झा ने बताया कि गौरैया हमारी बचपन की साथी पक्षी है और अब ये विलुप्ति के कगार पर है। इसलिए हमें अपने हिस्से का काम करना होगा और अपनी गौरैया को बचाना चाहिए। इसे लेकर हम भी काफी प्रयास कर रहे हैं। लेकिन हर एक को अपने स्तर का प्रयास करना होगा तभी ये सफल होगा। मानव ऑर्गेनाइजेशन के सचिन जैन बताते है कि हमारी एक मुहीम है जिसका टैगलाइन है गौरैया संवाद। इसके अंतर्गत हर घर गौरैया कार्यक्रम आता है। आगामी विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। इस बार विभिन्न चैप्टर बनाकर गौरैया संरक्षण पर कार्य होगा जिसकी रणनीति जल्दी ही पर्यावरणविद्धों के साथ मीटिंग करके बनाई जाएगी।





