Wednesday, February 11, 2026
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दौरा पड़ने पर मुंह में चम्मच डाल देनी चाहिए? एक्सपर्ट ने बताया एपिलेप्सी से जुड़े ऐसे ही 5 मिथकों का सच

मिर्गी एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, न कि मानसिक बीमारी। समाज में इससे जुड़ी कई गलतफहमियां फैली हैं, जो दौरे के दौरान मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। डॉ. अमित कुमार अग्रवाल ने इन मिथकों को दूर किया है। दौरे पड़ने पर मरीज के मुंह में चम्मच या कोई वस्तु न डालें, न ही उसे जबरदस्ती पकडें।

एपिलेप्सी एक ऐसी कंडीशन है, जिसे लेकर समाज में आज भी कई गलत जानकारियां फैली हुई हैं। जागरूकता की कमी के कारण अक्सर लोग दौरे पड़ने पर सही मदद करने के बजाय ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के न्यूरोसाइंसेज, न्यूरोलॉजी और स्ट्रोक मेडिसिन विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अमित कुमार अग्रवाल बताते हैं कि मिर्गी कोई मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है जिसे सही जानकारी और इलाज से मैनेज किया जा सकता है। आइए डॉ. अग्रवाल से जानते हैं एपिलेप्सी से जुड़े उन 5 बड़े मिथकों की सच्चाई, जिन पर लोग आज भी यकीन करते हैं।

मिथक 1- जीभ कटने से बचाने के लिए मुंह में चम्मच, वॉलेट या लकड़ी डाल देनी चाहिए।

सच्चाई- यह सबसे खतरनाक मिथकों में से एक है। दौरा पड़ने पर मरीज के मुंह में कभी भी कुछ नहीं डालना चाहिए। ऐसा करने से मरीज के दांत टूट सकते हैं, जबड़े में चोट लग सकती है या सांस की नली ब्लॉक हो सकती है, जिससे दम घुटने का खतरा बढ़ जाता है। लोग अक्सर डरते हैं कि मरीज अपनी जीभ निगल जाएगा, लेकिन यह संभव नहीं है। अगर जीभ पर हल्की चोट आती भी है, तो वह उतनी खतरनाक नहीं होती जितना कि बाहरी वस्तु डालने से होने वाली सांस की रुकावट।

क्या करें- जब झटके रुक जाएं, तब व्यक्ति को धीरे से करवट दिलाएं ताकि सांस की नली खुली रहे।

मिथक 2- झटकों को रोकने के लिए व्यक्ति को जोर से पकड़ लेना चाहिए।

सच्चाई- दौरे के दौरान किसी को जबरदस्ती पकड़ना या दबाना बहुत जोखिम भरा है। दरअसल, पकड़ने से दौरा नहीं रुकता, बल्कि इससे मरीज की मांसपेशियों में खिंचाव, फ्रैक्चर या जोड़ों के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है।

क्या करें- आसपास की नुकीली या सख्त चीजों को हटा दें, सिर के नीचे मुलायम कपड़ा रखें और दौरे को अपने आप शांत होने दें।

मिथक 3- सभी दौरों में मरीज जमीन पर गिरकर हिंसक रूप से कांपने लगता है।

सच्चाई- फिल्मों में अक्सर यही दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत अलग है। डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि ज्यादातर दौरे काफी सूक्ष्म होते, जैसे- अचानक एक जगह टकटकी लगाकर देखना, होंठ चबाना, अचानक भ्रमित होना या हाथ-पैर की अजीब सी हरकतें। इन्हें अक्सर लोग पहचान नहीं पाते, जिससे इलाज में देरी होती है। सही समय पर पहचान और डॉक्टरी सलाह बहुत जरूरी है।

मिथक 4- चमकती लाइट्स हर मिर्गी के मरीज के लिए दौरा पैदा करती हैं।

सच्चाई- फोटोसेंसिटिव एपिलेप्सी केवल 5% से भी कम मरीजों में पाई जाती है। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ज्यादातर मरीजों के लिए नींद की कमी, दवा छोड़ना, तनाव, इन्फेक्शन या शराब जैसे कारण ट्रिगर बनते हैं। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के हर मरीज के लिए स्क्रीन या लाइट से परहेज करना जरूरी नहीं है।

मिथक 5- मिर्गी एक मानसिक बीमारी या बौद्धिक अक्षमता है।

सच्चाई- एपिलेप्सी एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, न कि कोई मनोरोग। इसका व्यक्ति की बुद्धिमत्ता या मानसिक क्षमता से कोई सीधा संबंध नहीं है। दुनिया भर में मिर्गी से प्रभावित लाखों लोग सफल छात्र, डॉक्टर, पेशेवर और माता-पिता के रूप में एक सामान्य और स्वतंत्र जीवन जी रहे हैं।

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