Tuesday, February 24, 2026
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SBI ने गलत तरीके से वसूले थे ₹4400, अब महिला को लौटाने पड़ेंगे ₹1.7 लाख; आपका बैंक तो नहीं वसूल रहा बिना वजह ये चार्ज?

दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एसबीआई (SBI) को एक महिला ग्राहक को 1.7 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। बैंक ने महिला के खाते में पर्याप्त पैसे होने पर भी गलत तरीके से ईसीएस बाउंस शुल्क लगाया था। महिला ने एचडीएफसी बैंक से कार लोन लिया था और एसबीआई खाते से ईएमआई कटने का निर्देश दिया था, लेकिन 11 ईएमआई बाउंस हो गईं।

दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Delhi State Consumer Disputes Redressal Commission) ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को एक महिला उपभोक्ता को 1.7 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने पाया कि बैंक ने महिला के खाते में पर्याप्त फंड होने के बावजूद गलत तरीके से ईसीएस (इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सर्विस) बाउंस शुल्क लगाया।

क्या है पूरा मामला

मामला ये है कि एक महिला ग्राहक ने एचडीएफसी बैंक से कार लोन लिया था और बैंक को निर्देश दिया था कि वह उनके एसबीआई बचत खाते से उनकी मासिक ईएमआई (समान मासिक किस्त) काट ले। हालाँकि, उनकी 11 ईएमआई बाउंस हो गईं और एसबीआई ने उनसे हर बार 400 रुपये का शुल्क लिया।
वे हैरान रह गईं, क्योंकि उन्होंने हमेशा अपने बैंक खाते में पर्याप्त राशि रखी थी। अपने दावे के सबूत के तौर पर, उन्होंने अपना बैंक स्टेटमेंट प्रिंट करके बैंक को जमा कर दिया।

बैंक ने नहीं लौटाया पैसा

एसबीआई ने बाउंस शुल्क वापस करने से इनकार कर दिया। इसके नतीजे में, उन्होंने साल 2010 में जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनका दावा खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) का रुख किया, जिसने मामले को वापस दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग को भेज दिया। वहाँ उन्होंने अंततः 9 अक्टूबर, 2025 को मुकदमा जीत लिया।

क्या दी एसबीआई ने दलील

एसबीआई ने कहा था कि ईसीएस मैंडेट में दी गई जानकारी सही नहीं थी, जिसके चलते महिला के चेक बाउंस हो गए। हालाँकि, शर्मा ने तर्क दिया कि अगर ऐसा होता, तो उसी ईसीएस मैंडेट के तहत अन्य ईएमआई कैसे वैलिड की जा सकती थीं? दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने भी उनकी बात से सहमति जताई और कहा कि एसबीआई का तर्क सही नहीं है।

17 साल झेली परेशानी

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने कहा कि ध्यान देने वाली बात ये है कि अपीलकर्ता ने 15 अप्रैल, 2008 को रेस्पॉन्डेंट नंबर 2 (एचडीएफसी बैंक) से कर्ज लिया था और रेस्पॉन्डेंट्स की ओर से सर्विस में कमी के कारण 2010 में जिला फोरम में शिकायत दर्ज कराई थी। तब से, वह मुकदमेबाजी की पीड़ा झेल रही है। इसीलिए महिला को मुआवजा देने की बात कही गयी है।

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