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बाग़-ए-फि दक! एक जवाब और इख़्तेलाफ ख़त्म

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वक़ार रिज़वी 
 
बाग़-ए-फिदक का जवाब और इख़्तेला$फ ख़त्म
हमने हमेशा कोशिश की, कि आलमे इस्लाम में इत्तेहाद बाक़ी रहे, इत्तेहाद को बाक़ी रखने के लिये इख़तेलाफ़ की वजह जानना बेहद ज़रूरी है। इस उम्र तक पहुंचने के बाद तमाम लोगों से इख़्तेलाफ़ समझने की कोशिश की जिसमें एक वजह बाग़-ए-फि़दक भी है जिसके बारे में बार-बार सवाल किया जाता है। हमारी महदूद वुसअते नजऱ यह कहती है कि इसका जवाब अगर आ जाये तो शायद बहुत से इख़्तेलाफ़ात अपने आप ख़त्म हो जायें।
आज रसूल की बेटी जनाबे फ़ातिमा ज़हरा की विलादत की तारीख़ है उनके सभी चाहने वाले यक़ीनन ख़ुश होंगें क्योंकि आलमें इस्लाम के सभी फिऱक़े जनाबे फ़ातिमा ज़हरा को बेहद इज़्ज़त-ओ-एहेतराम की नजऱ से देखते हैं और क्यों न देखें आलमें इस्लाम में जिन ख़्वातीनों को जि़क्र हैं उनमें जनाबे फ़ातिमा को इंफरादियत हासिल है। एक ख़ातून की जि़न्दगी में तीन ऐसे मौक़े आते हैं जब वह फ़ंख्र कर सकती है एक तब जब वह किसी की बेटी होती है तो रसूल जैसा अज़ीम न किसी को बाप मिला और मल्लिका-ए-अरब जनाबे ख़दीजा जैसी किसी को मां मिली दूसरा फख़़्र ख़ातून अपने शौहर पर करती है तो हजऱत अली जैसा साक़ी-ए-कौसर, बाबुल इल्म, शेरे ख़ुदा …. किसी को नहीं मिला, तीसरा फ़ख्र एक ख़ातून अपने बच्चों पर करती है तो यह फ़ख्र भी वाहिद उन्हीं के हिस्से में आया जिनके बच्चे जवानाने जन्नत के सरदार हों। वह मां आखिऱ क्यों न फ़ख्र करे।
जनाबे फ़ातिमा न होती तो रसूल की सुन्नत मर्दों के लिये तो नमूना-ए-अमल बनती लेकिन औरतों के लिये नहीं यानि रसूल की रिसालत में भी वह शरीक रहीं। तमाम ख़्वातीन को अपने एक जुमलें से कय़ामत तक नसीहत दे दी कि एक औरत की कामयाबी उसके शौहर की नजऱ में क्या है। शादी के दूसरे दिन जब रसूल ने अपने भतीजे और दामाद हजऱत अली से अपनी बेटी के बारे में पूछा कि अली तुमने फ़ातिमा को कैसा पाया तो अली ने जवाब दिया कि अपनी इबादत में मददगार। अगर सिर्फ इस एक जुमले पर तमाम ख़्वातीन अमल कर लें तो दुनियां और आख़ेरत दोनो संवर जाये।
कौन जनाबे फ़ातिमा ? वह फ़ातिमा जिनकी मां मल्लिक-ए-अरब थी। अरब का सारा कारोबार उन्हीं की दौलत से चलता था। बड़े-बड़े ताजिर उन्हीं से माल लेते थे और बेचते थे। ख़ुद रसूल्लाह भी उन्हीं से माल लेकर कारोबार करते थे। सारी की सारी दौलत उनकी मां की तरफ़ से थी और वह एक ऐसी बेटीं थी जिनकी सिफ़ाअत की बुनियाद पर ख़ुद रसूल उनकी ताज़ीम करते थे क्योंकि वह सिद्दीक़ ही नहीं सादिक़ा भी थीं। यानि वह सच ही नहीं बोलती थी बल्कि जो बोल देती थीं अल्लाह उसी को सच कर देता था।
ईद के रोज़ जब उनके बेटों हजऱत हसन और हुसैन ने अपनी मादर-ए-गिरामी से कहा कि कल ईद है सब लोग नये कपड़े पहनेगें हमारे नये कपड़े नहीं हैं तो जनाबे फ़ातिमा ने कहा कि कपड़े सिलने गये हैं कल दर्ज़ी  लेकर आयेगा, और ईद के रोज़ जब जन्नत से फ़रिश्ता कपड़े लेकर आया तो उसने दक्कुलबाब करने के बाद यही कहा कि दजऱ्ी कपड़े लेकर आया है। हज़ारों बार उम्मते मुस्लिमां की ज़बानी यह वाक्य़ा हम सब ने सुना है। अगर यह वाक्य़ा सही है, यक़ीनन सही ही होगा क्योंकि अगर सही न होता तो 14 सौ साल से मुसलमानों के सभी फिऱक़े इसे हर रोज़ सुनने के बाद यूं ख़ामोश न होते। इस वाक्य़े से एक बात साबित होती है कि दुनियां में हमेशा सच बोलने वाले तो हुये लेकिन कोई ऐसा शायद नहीं हुआ, कि जो वह बोल दे वही सच हो जाये। जनाबे फ़ातिमा ने अगर कह दिया कि कपड़े दर्ज़ी  के यहां है तो अल्लाह की तरफ़ से आने वाले फ़रिश्ते ने अपने को दर्ज़ी  ही कहा, फ़रिश्ता नहीं।
यह वह है जो हम हर रोज़ उम्मते मुस्लिमां की ज़बानी सुनते हैं लेकिन अल्लाह ने अपनी आसमानी किताब क़ुरआन-ए-मजीद में भी जनाबे फ़ातिमा की सदाक़त की शहादत दी। एक मुसलमान होने के नाते हमारा ईमान आसमानी किताब क़ुरआन मजीद और उसकी सभी आयात पर है। आयते मुबाहेला में इसका जि़क्र है, जब रसूल ने नजरान के नसारा को मुबाहिले की दावत दी और कहा कि तुम अपने नफ़्सों को लाओं, अपने बच्चों को लाओं और अपनी औरतों को लाओ और सब मिलकर एक दूसरे पर लानत करें। जवाब में रसूल नफ़सों की सूरत में सिफऱ् हजऱत अली को लेकर आयें, बच्चों की सूरत में हसन और हुसैन को लेकर आये और औरतों की सूरत में सिफऱ् जनाबे फ़ातिमा ज़हरा को लेकर आये, और जब इन सब को लेकर रसूल अपने साथ आ गये तो मुक़ाबले पर आये लोगों ने यह कह कर मुक़ाबला करने से इंकार कर दिया कि रसूल जिन लोगों को अपने साथ लेकर आये हैं यह इतने सच्चे हैं कि अगर पहाड़ों को भी इशारा कर दें तो पहाड़ अपनी जगह छोड़ दें।
रसूल की एक ऐसी आला मरतबत बेटी जिसकी सदाक़त की शहादत अल्लाह आयते मुबाहेला के ज़रिये अपनी किताब में दें और आलमें इस्लाम उस वाक्य़े को सुन-सुन कर झूम उठे। जिसमें अगर फ़ातिमा-ए-ज़हरा ने फऱमा दिया कि कल कपड़े दर्ज़ी  के यहां हैं तो अल्लाह की जन्नत से आने वाले फ़रिश्ते ने अपने को दर्ज़ी  ही कहा फ़रिश्ता नहीं। रसूल की वफ़ाअत के बाद ऐसा वक़्त कैसे आ गया जब रसूल की यही आला मरतबत बेटी जिसकी मां मल्लिका-ए-अरब हों, दरबार में अपना हक़ तलब कर रही है और उम्मतें मुस्लिमां उनसे गवाही मांग रही है। मैं अपनी लाइल्मी की बुनियाद पर यही जानता हूं कि गवाही की ज़रूरत वहां होती है जहां यक़ीन न हो। दूसरे यह भी उम्मते मुस्लिमा को ग़ौर करना चाहिये कि बा$ग-ए-$िफदक जनाबे फातिमा के पास आया कहां से? अगर रसूल (स.) ने उन्हें दिया तो क्या माज़अल्लाह, अल्लाह के रसूल ने अमानत में ख्यानत की और जब मुसलमानों के नबी ने अपनी ङ्क्षज़दगी में दे दिया तो मुसलमानों को यह हक किसने दिया कि वह रसूल  की दी हुई चीज़ को वापस लें।
शहर के बहुत बड़े आलिम, दानिश्वर इस्लामी तारीख़ पर बहुत गहरी नजऱ रखने वाले लखनऊ यूनीविर्सिटी के साबिक़ प्रोफ़ेसर और अपने शोबे के सद्र एक बार मेरे दफ़्तर तशरीफ़ लाये यक़ीनन वह हमसे बेपनाह मोहब्बत करते हैं और बेतकल्लुफ़ भी। इसी बाबत मैनें हिम्मत करके उनकी खि़दमत में बाग़-ए-फि़दक के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बड़ी शफ़क़त से मोहब्बत से तमाम हवालों से समझाने की कोशिश की। उनके समझानें के बाद बस हमने यह सवाल कर दिया कि 1400 साल बाद आप सबकुछ जानते हैं लेकिन रसूल की वफ़ात के फ़ौरन बाद रसूल की वह बेटी जो जन्नत में औरतों की सरदार है। जिसका आयते मुबाहेला में जि़क्र हैं। जिसके बच्चे जवानाने जन्नत के सरदार हैं। जिसके शौहर को अभी आपके हिसाब से खि़लाफ़त मिलनी है (बागे फि़दक़ के वाक्य़े के वक़्त हजऱत अली ख़लीफ़ा नहीं थे) इनमें से कोई कुछ न जानता था जो आप जानते हैं जबकि हम में से कोई जन्नत का दावा नहीं कर सकता। मेरा यह सवाल करना था कि वह फ़ौरन उठे और चुपचाप दफ़्तर से चले गये, मेरा सवाल फिर वहीं का वहीं रह गया।
आज भी मेरा यह सवाल आपके जवाब का मुंतजिऱ है कि आप जो जन्नत का दावा नहीं कर सकते, 14 सौ साल बाद भी वह सबकुछ जानते हैं जो रसूल की वफ़ात के फ़ौरन बाद रसूल की वह बेटी जो जन्नत में औरतों की सरदार है, जिसका आयते मुबाहेला में जि़क्र हैं, जिसके बच्चे जवानाने जन्नत के सरदार हैं, जिसका शौहर मुसलमानों का ख़लीफ़ा है इनमें से कोई कुछ न जानता था जो आप जानते हैं?
हमनें हमेशा कोशिश की कि आलमें इस्लाम में इत्तेहाद बाक़ी रहे, इत्तेहाद को बाक़ी रखने के लिये इख़तेलाफ़ की वजह जानना बेहद ज़रूरी है। इस उम्र तक पहुंचने के बाद तमाम लोगों से इख़्तेलाफ़ समझने की कोशिश की जिसमें एक वजह बाग़-ए-फि़दक भी है जिसके बारे में बार-बार सवाल किया जाता है। हमारी महदूद वुसअते नजऱ यह कहती है कि इसका जवाब अगर आ जाये तो शायद बहुत से इख़तेलाफ़ अपने आप ख़त्म हो जायेंगें।
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