जहरीली हवा से घटी औसत उम्र

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जहरीली हवा से घटी औसत उम्र

नई दिल्‍ली। दुनियाभर में वायु प्रदूषण की समस्‍या एक विकराल रूप अख्तियार कर चुकी है। दुनिया के करीब 91 फीसद आबादी ऐसी हवा में सांस लेने को मजबूर है, जो उसके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बेहद हानिकारक है। भारत में भी यह एक गंभीर समस्‍या का रूप ग्रहण कर चुका है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने भी वायु प्रदूषण को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है। संगठन ने वायु प्रदूषण को हमारे स्‍वास्‍थ्‍य को नुकसान पहुंचाने वाला सबसे प्रमुख पर्यावरण संबंधी खतरा बताया है। हाल में वायु प्रदूषण को लेकर संयुक्‍त राष्‍ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यूएनइपी की चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। आइए जानते हैं इस रिपोर्ट के बारे में ? आखिर क्‍या है भारत की स्थिति ? सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्‍या भारत में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कोई ठोस कानून है ?

दुनिया में वायु प्रदूषण को रोकने में सख्‍त कानून का अभाव

1- पर्यावरणविद विजय बघेल का कहना है कि भारत ही नहीं दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील मुल्‍क वायु प्रदूषण की समस्‍या से जूझ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ ने वायु गुणवत्ता को लेकर जरूरी दिशानिर्देश बहुत पहले ही जारी किए थे, लेकिन उन्हें अभी भी वैश्विक स्तर पर लागू करने के लिए कोई कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए 34 फीसद देशों में कोई जरूरी कानून नहीं है। महज 33 फीसद मुल्‍कों ने वायु गुणवत्‍ता के मानको को पूरा करने संबंधी दायित्‍वों को लागू किया है।
2- उन्‍होंने कहा कि 49 फीसद देशों ने इसे एक खतरे के रूप में चिन्हित किया है। इतना ही नहीं वायु प्रदूषण को रोकने के लिए ज‍िन देशों में कानून है भी वह विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन द्वारा जारी मानकों के अनुरूप नहीं है। यह जानकारी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा वायु गुणवत्ता कानूनों और नियमों पर जारी एक नई रिपोर्ट में सामने आई है।

3- यूएनइपी की रिपोर्ट में दुनिया के 194 मुल्‍कों और यूरोपिय यूनियन में वायु गुणवत्‍ता संबंधी नियमों और कानूनों की जांच की गई है। इस रिपोर्ट में इस बात का आंकलन किया गया है कि दुनिया के देश वायु प्रदूषण को लेकर कितने गंभीर और सजग हैं। देशों ने इस समस्‍या को कितनी गंभीरता से कानूनी तौर पर लागू किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक अधिकतर अफ्रीकी देशों में इन मानकों का अभाव है।

4- बघेल का कहना है कि चौंकाने वाली बात यह है कि वैश्विक स्तर पर जिन देशों में वायु गुणवत्ता को लेकर जारी मानकों को अपनाया है वह भी डब्ल्यूएचओ के मानकों से मेल नहीं खाते हैं। वहां देशों ने इन्हें अपने आधार पर तय किया है। उदाहरण के लिए डब्लूएचओ ने हवा में पीएम 2.5 की गुणवत्ता के लिए जो मानक तय किया है वो 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। वहीं भारत सरकार ने पीएम 2.5 के लिए 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर का मानक तय किया है।
भारत में भी इसके लिए नहीं है ठोस कानून

1- पर्यावरणविद विजय बघेल का कहना है कि वायु प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिसकी कोई सीमा नहीं है, आप हवा को बांध नहीं सकते, जिस ओर बयार चलती है वो अपने साथ इस प्रदूषण को भी ले जाती है। इसलिए यह समझना होगा कि यह किसी एक मुल्‍क की समस्‍या नहीं है बल्कि यह पूरी मानव जाति की जिम्मेवारी है। इसके बावजूद दुनिया में महज 31 फीसद देशों के पास सीमा पार से आने वाले वायु प्रदूषण को संबोधित करने के लिए कानूनी तंत्र हैं। भारत के पास इसके लिए कोई ठोस कानून नहीं है।
2- उन्‍होंने कहा कि वायु प्रदूषण हर वर्ष 70 लाख लोगों की जान ले रहा है, यदि इसे रोकने के लिए अभी से गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो यह आंकड़ा 2050 तक 50 फीसद तक बढ़ जाएगा। उन्‍होंने कहा कि जिस हवा में हम सांस लेते हैं वो सभी की बुनियादी जरूरत है। ऐसे में सरकारों को चाहिए की वह स्वच्छ और सुरक्षित हवा को बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाए।

3- उन्‍होंने कहा कि दिल्ली जैसे शहरों में जहां हर कोई वायु गुणवत्ता को लेकर चिंतित है। ऐसे में सिर्फ कानूनों से काम नहीं चलता, हमें इसके लिए जवाबदेही तय करनी होगी। इसके लिए जनता को जागरूक करना होगा। सरकारों को इस समस्‍या से निपटने के लिए इच्‍छाशक्ति के साथ पेश आना होगा।

भारत में जानलेवा बना वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण भारत में एक गंभीर समस्‍य बन चुका है। अमेरिका के शिकागो विश्‍वविद्यालय के एनर्जी पालिसी इंस्टिट्यूट द्वारा जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है कि यदि इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो इसकी वजह से प्रत्‍येक भारतीय का जीवन छह वर्ष कम हो जाएगा। इसे सरल शब्‍दों में समझे तो लोगों की औसत उम्र करीब छह वर्ष घट जाएगी। देश की राजधानी दिल्‍ली और लखनऊ की तस्‍वीर और भी भयावह और चौंकाने वाली है। यहां लोगों की औसत उम्र नौ वर्ष से अधिक घटने की आशंका जताई गई है। स्‍टेट आफ ग्‍लोबन एयर की रिपोर्ट के मुताबिग देश में 1,16,000 से अधिक शिशुओं की मौत के लिए वायु प्रदूषण जिम्‍मेवार है। इसके चलते 2019 में करीब 16.7 लाख लोगों की जान गई थी।