घर में अपने बच्चों से मसायब ए फ़ातिमा बयान करो ताकि घर में बरकतों का नुज़ूल हो - मौलाना मेराज हैदर खान

हदीस ए किसा की इब्तिदा का नाम फ़ातिमा ज़हरा स.अ. व इन्तेहा का नाम काबा

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घर में अपने बच्चों से मसायब ए फ़ातिमा बयान करो ताकि घर में बरकतों का नुज़ूल हो  - मौलाना मेराज हैदर खान

अवधनामा संवाददाता


बाराबंकी । फ़ातिमा यानी उम्मुल बनीन " उम्मत की मां " क़ाबा यानी उम्मुल कुरा " ज़मीन को वजूद में लाने वाली " हदीस ए किसा की इब्तिदा का नाम फ़ातिमा ज़हरा स.अ. व इन्तेहा का नाम काबा ।इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि क़ाबा न होता तो ज़मीन का वजूद न होता और फ़ातिमा न होतीं तो  इंसानों का वजूद न होता ।इंसानियत के वजूद का नाम फ़ातिहा है। यह बात अजा़ए फ़ातमियां की दूसरी मजलिस को ख़िताब करते हुए करबला सिविल लाइन में आली जनाब मौलाना मेराज हैदर ख़ान साहब ने कही। उन्होंने यह भी कहा कि सलाम करते हुए मस्जिद में दाखिल हो । मरकजे़ आयये ततहीर का नाम फ़ातिमा है , आयये ततहीर की जैसी शाने नुज़ूल है वैसे किसीऔर आयत की नहीं । क़ुरआन में हदीस ए किसा गवाह है कि अली को अमीरल मोमनीन सबसे पहले फ़ातिमा स.अ. ने कहा । घर में अपने बच्चों से मसायब ए फ़ातिमा बयान करो ताकि घर में बरकतों का नुज़ूल हो ।आखिर में जनाब ए फ़ातिमा ज़हरा  स.अ. के मसायब पेश किए।जिसे सुनकर सभी रोने लगे । मजलिस से पहले डा.रज़ा मौरानवी ने पढ़ा  - वो जिसपे आके ये पत्थर सलाम करते हैं , वो हाथ फ़ातिमा तुमको सलाम करते हैं ।बाक़र नक़वी ने पढ़ा  - अल्लाह की रिज़ा का वसीला है फ़ातिमा । सरदार ए अम्बिया की तमन्ना है फ़ातिमा ।मुजफ्फर इमाम ने पढ़ा  - बज़अतो मिन्नी ने बताया है फा़तिमा तेरा मुस्तुफा होना । हाजरा ,आसिया औ  मरियम से पूंछिये क़्या है फ़ातिमा होना । हाजी सरवर अली करबलाई ने पढ़ा - छोड़कर दुनियां की लालच राहे हक़ पर चल पड़ो । है सफ़र मुश्किल मगर मंज़िल तो पा ली जाएगी । तब कहीं जाकर मिलेगी क़ुरबतें मासूम की , जब हसद दिल के मकानों से निकाली जाएगी।इसके अलावा रज़ा मेहदी व मो. ग़ाज़ी सल्लमहू ने भी नज़रानये अक़ीदत पेश किया। मजलिस का आग़ाज़ तिलावते कलाम ए इलाही से मौलाना अब्बास मेहदी "सदफ़" साहब ने किया । अन्जुमन गुन्चये अब्बासिया ने नौहाख्वानी व सीनाज़नी की । सोमवार ए फा़तिमा ज़हरा ने शमा जलाकर जन्तुल बक़ी को रौशन किया ।बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया ।