Monday, March 30, 2026
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HomeUttar PradeshLalitpurजीवन में जो अन्याय न होने दे वही न्याय : मुनिश्री

जीवन में जो अन्याय न होने दे वही न्याय : मुनिश्री

अवधनामा संवाददाता

 

ललितपुर। क्षेत्रपाल मंदिर में मुनिश्री सुधासागर महाराज ने सामान्य भाषा में लोगों से पूंछा कि न्याय क्या है ? किसी के जीवन में जो अन्याय न होने दे वही न्याय है।ऐन केन प्राकरेण व्यक्ति लोकप्रिय बनना चाहता है पर उन्होंने लोकप्रिय नहीं न्याय प्रिय बनो। उन्होंने विकृत मानसिकताओं पर प्रहार करते हुए कहा कि पापी नहीं पाप पर प्रहार करो। विचारक नहीं विचारों का खंडन करो। पर आज देखने में आता हे कि जिसके हहमें विचार पसंद नहीं हम विचारों के साथ साथ विचानक से भी द्वेष करने लगे हैं। उन्होंने कहा कि हमें जिसके सिद्धान्त पसंद नहीं हैं हम आज उसको ही रास्ते से हटा देते हैं। डाक्टर रोगी की दवा करता है या रोग की। लगता तो है कि रोगी का इलाज हो रहा है पर असल में रोग का ही इलाज किया जाता है। अगर तुम्हें किसी की बात पसंद नही ंतो वडी ही शालीनता से तर्कों के द्वारा बुद्धि से आगम से उदाहरण से अपना पक्ष रखो पर तुम्हें विचारक के चरित्र का हनन करने का अधिकार नहीं है। तीन दिवसीय प्रमेय रत्नमाला अनुशीलन युवा विद्वत संगोष्ठी एवं श्रमण संस्कृति स्नातक परिषद का अधिवेशन मुनिपुंगव सुधासागर महाराज के मंगल सानिध्य में प्रारंभ हुआ। अधिवेशन में प्रमेय रत्नमाला न्याय ग्रन्थों में ब्रहम अद्वैतवाद की समीक्षा व जैन एवं बौद्ध धर्म में प्रत्यक्ष प्रमाण का स्वरूप आलेख प्रस्तुत किया। देश भर से जुटे लगभग पांच सौ विद्वानों को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि विद्वान सारे भूमडल का गौरव हैं विद्वान के पांडित्य की सर्व. प्रशंसा होती है लेकिन ज्ञानी का सबसे बडाउद्देश्य व्यक्तित्व का विकास कर आत्म निर्भर बनना है। कोयल का सौन्दर्य उसके स्वर में है स्त्री का सोन्दर्य उसके पतिब्रत धर्म में है, पर ज्ञानी का सौन्दर्य अपने विकारी परिणामों को समाप्त करने में है। विद्वान को चारों अनुयोगों प्रथानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग एवं द्रव्यानुयोग में पारंगत होना आवश्यक है साथ ही दव्यानुयोग के तीनों भेद कर्म सिद्धान्त आध्यात्म एवं न्याय इसमें भी महारथ होनी चाहिए तब कहीं तुम विद्वाानों की कोटि में आओगे। न्याय का प्रमुख ग्रन्थ प्रमेय रत्नमालापर अपना आलेख प्रस्तुत किया, जिसमें अद्वेतवाद एवं द्वेतवाद को बिन्दु करते हुए परिभाषित किया। सगोष्ठी में जैन दर्शन के मर्म सामाजिक सहयोग पर्यावरण संरक्षण आदि प्रचार में स्नातक विद्वानेों की क्या भूमिका हो सकती है इस पर भी चर्चा हो रही है।

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