बसपा मिशन 2027 के लिए नई रणनीति के साथ तैयार है। मायावती नेतृत्व करेंगी, जबकि आकाश आनंद 75 जिलों में रैलियों के माध्यम से संगठन में ऊर्जा भरेंगे। कम प्रतिनिधित्व के बावजूद, बसपा दलित, ब्राह्मण, अल्पसंख्यक और ओबीसी पर केंद्रित अपनी सोशल इंजीनियरिंग को पुनर्जीवित करना चाहती है, अपने महत्वपूर्ण दलित वोट बैंक का लाभ उठाते हुए।
साल 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद से लगातार अपना जनाधार खोती चली गई बसपा अब नई आस और प्रयास के साथ अंगड़ाई लेने के लिए तैयार है।
कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर लखनऊ में जुटी पार्टी समर्थकों की भीड़ ने विशेष तौर पर मायावती को मनोबल और संबल दिया है, जिसके सहारे उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं तक संदेश पहुंचाया है कि विधानमंडल और संसदीय सदन में भले ही पार्टी शून्य की कगार पर खड़ी हो, लेकिन सड़कों पर बसपा अभी बाकी है।
मिशन-2027: सोशल इंजीनियरिंग का दांव
मिशन-2027 के लिए एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग का दांव आजमाने के लिए भरोसे का प्रतीक पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ही होंगी, जबकि संगठन में ऊर्जा संचार करने का जिम्मा उनके भतीजे और पार्टी के नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद का होगा, जिनकी उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में रैलियां आयोजित करने की रणनीति पर काम चल रहा है।
कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति की धुरी रही बसपा की वर्तमान में स्थिति यह है कि लोकसभा में वह शून्य है, राज्य सभा में एकमात्र सदस्य हैं, जिनका कार्यकाल इसी वर्ष पूर्ण होने जा रहा है और उत्तर प्रदेश विधानसभा में मात्र एक सदस्य हैं।
प्रत्यक्ष तौर पर यहां से बसपा नगण्य दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि करीब 22 प्रतिशत दलित मतदाता वाले इस राज्य में चुनावी गणित बनाने-बिगाड़ने की स्थिति में होने के कारण ही बसपा की प्रासंगिकता बनी हुई है।
बसपा का बुरा दौर
बहुत बुरे दौर से गुजरने के बावजूद 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 12.88 प्रतिशत वोट मिला, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में 9.39 प्रतिशत वोट पाया।
माना जाता है कि 16 सीटों पर बसपा ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का खेल बिगाड़ा, जबकि कई सीटें उसी के कारण भाजपा के हाथ से भी फिसलीं।
अपने दल की इस ताकत को मायावती जानती हैं, क्योंकि दलित वोटों में भाजपा और सपा की मजबूत सेंध के बावजूद इस वोटबैंक में सबसे बड़े भागीदार जाटव बिरादरी (22 में से 11 प्रतिशत) पर उनकी पकड़ बनी हुई है। यही बसपा की आस की प्राण-संजीवनी है।
ऐसे में मायावती अब चाहती हैं कि एक बार फिर उत्तर प्रदेश में सफल रहे 2007 विधानसभा चुनाव के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को फिर आजमाया जाए।
इसी कारण अपने जन्मदिन पर उन्होंने ब्राह्मणों को रिझाने का प्रयास किया, अल्पसंख्यकों के लिए लगातार प्रयासरत रहती ही हैं। इनमें सबसे खास रणनीतिक बदलाव यह है कि पार्टी मिशन-2027 में युवा चेहरे को सक्रिय करने जा रही है।
75 जिलों में मायावती की ताबड़तोड़ रैलियां
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि रणनीति बन रही है कि आकाश आनंद की प्रदेश की सभी 75 जिलों में रैलियां कराई जाएं। वह मायावती का संदेश सर्वसमाज तक पहुंचाएंगे।
वहीं, जिला और मंडल स्तर के संगठन की जिम्मेदारी होगी कि रैलियों से लेकर मंच तक दलित, ब्राह्मण और अल्पसंख्यकों की मजबूत भागीदारी दिखे। ओबीसी को भी साथ जोड़ने की कोशिश होगी।
निचले स्तर पर अभी कार्यक्रम नहीं पहुंचा है, लेकिन तैयारियों के लिए संकेत दे दिया गया है। पार्टी मानती है कि आकाश आनंद युवा समर्थकों को भी जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं।





