हजपुरा, अंबेडकरनगर मज़हब-ए-इस्लाम में रोज़ा को रहमत और राहत का सबसे बड़ा जरिया माना गया है। रहमत से तात्पर्य अल्लाह की असीम मेहरबानी से है, जबकि राहत इंसान के दिल को मिलने वाले सुकून और रूहानी तसल्ली का प्रतीक है। जब बंदे पर अल्लाह की रहमत नाज़िल होती है तो उसके दिल को सच्चा सुकून नसीब होता है, जो नेकी, परहेज़गारी और नेक अमल से जुड़ा होता है।
शनिवार को रमज़ान और रोज़े की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए मछली गांव के इमाम-ए-जुमा मौलाना सैयद नूरुल हसन ने कहा कि रोज़ा केवल भूख और प्यास सहने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, आत्मशुद्धि और रूहानी तरक्की का माध्यम है। रोज़ा इंसान को बुराइयों से दूर रहने, अपने नफ़्स पर काबू पाने और अच्छाइयों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि रोज़ा गुस्सा, लालच, घमंड, फरेब, फसाद, बेईमानी और बदनीयती जैसी तमाम बुराइयों पर नियंत्रण सिखाता है तथा सब्र, हिम्मत और हौसले का संदेश देता है। जब कोई इंसान रोज़ा रखकर अपनी ज़बान, सोच और व्यवहार पर काबू रखता है, तो वह अल्लाह की रहमत और मगफिरत का हकदार बन जाता है।
मौलाना ने आगे कहा कि नेकनीयत से रखा गया रोज़ा नूर की निशानी और सच्चे मुसलमान की पहचान है। रमज़ान का पाक महीना आत्ममंथन, इबादत और इंसानियत की सेवा का सुनहरा अवसर प्रदान करता है, जिससे समाज में अमन, भाईचारा और मोहब्बत का संदेश मजबूत होता है।





