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हक़ का साथ देने की उम्मीद और वह भी इनसे ?

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वकार रिजवी
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बस इसी का डर था, कीचड़ में ढेला फेंका जायेगा तो कीचड़ ही अपनी तरफ़ भी वापस आयेगा। पिछले सात साल से बस यही हो रहा है जिसने जिसके ख़िलाफ़ जो चाहा लिख दिया, इल्ज़ामतराशी कर दी, बोहतान लगा दिया। आयतुल्लाह हमीदुल हसन साहब ने अभी पिछले जुमें के अपने तारीख़ी मज़मून में सोशल मीडिया पर खेलने वाले ऐसे अफ़राद की क्या बेहतर तसवीरकशी की है कि ‘‘आजकल इंटरनेट पर बहुत आसान है जिसके लिये जो चाहा लिख दिया, दूसरे अलफ़ाज़ में इंटरनेट शेरों की कछार नहीं बुज़दिलों की मांड गुफ़ा की तरह हो गया है। किसी भी तहक़ीक़ की ज़रूरत नहीं, हम कहीं बिल्कुल अकेले बैठे हैं, उंगलियां चली और हम आलमी मजमें में आ गये, जो चाहा लिख दिया, नश्र कर दिया और फिर मोबाईल बंद और फिर किसी ग़ार में ग़ायब। इस लिख देने में, इसे कह देने में, इस इल्ज़ामतराशी में, क्या ज़रूरत किसी तहक़ीक़ किसी सबूत की किसी सनद की ? अपने एहसासे कमतरी या अपनी हसद के फफोले ही तो फ़ोड़ना है’’ आयतुल्लाह के एकक़लम से लिखे हुये यह चन्द अलफ़ाज़ पूरे मोआशरे में आज फैले एख़्तलाफ़ की तह में जाने के लिये काफ़ी हैं। आज मुतालबा किया जा रहा है कि आफ़ताब-ए-शरियत मौलाना कल्बे जवाद साहब के ख़िलाफ़ जो बेबुनियाद, बेहुदा, झूठे इल्ज़ामात लगाये जा रहे हैं उसकी सबको मज़म्मत करनी चाहिये, हक़ का साथ देना चाहिये, झूठ के ख़िलाफ़ आवाज़ बलन्द करनी चाहिये, यक़ीनन करनी चाहिये, पुरज़ोर तरीक़े से करनी चाहिये, ऐसे वक़्त में सबको अपने ज़ाती एक़तेलाफ़ भूलकर एकजुट होकर ऐसे अनासिर की न सिर्फ़ पुरजो़र मज़म्मत करनी चाहिये बल्कि ऐसे अफ़राद के ख़िलाफ़ कड़ी सज़ा का मुतालबा भी करना चाहिये जिससे फिर कोई किसी मासूम के ख़िलाफ़ ऐसे बेबुनियाद, बेहुदा, झूठे इल्ज़ामात लगाने की हिम्मत भी न कर सके, लेकिन कौन करेगा, यह शहर तो मुनाफ़िक़ों का शहर है, बुज़दिलों का शहर है, मौक़ापरस्तों का शहर है, हमने इसी शहर में हुकूमत बदलने के साथ हुसैनी टाइगर्स को गौरक्षक बनते देखा है, हमनें इसी शहर में मीर अनीस की मज़ार को आबाद न होने देने वालों का साथ देते देखा है, हमनें इसी शहर में मौलाना जाबिर साहब को हक़ की आवाज़ बलन्द करने पर यकोतन्हां देखा है, हमनें इसी शहर में मस्जिद नूर महल पर झूठे बोहतान पर मस्जिद नूर महल ही के गु्रप पर पिन चुप्पी साधते देख है ;च्पद क्तवच ैपसमदबमद्ध देखा है, हमने तो शरअंगेज़ शुमूलियत वाले इस्लाह ग्रुप पर उन मोलवियों पर भी मौत का सन्नाटा देखा है जिन्होंने न सिर्फ़ मस्जिद नूर महल में अशरा पढ़ा बल्कि कई जुमें की नमाज़ भी पढ़ायी, ऐसे लोगों से आफ़ताब-ए-शरियत मौलाना कल्बे जवाद साहब के हिमायती यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह ज़ुल्म और झूठ के ख़िलाफ़ आवाज़ बलन्द करें और हक़ का साथ दें। याद रखें दुनियां में जितनी बुराईयां हैं उसके ज़िम्मेदार बुरे लोग नहीं बल्कि वह अच्छे लोग हैं जो अपने आप को अच्छा समझते हैं और चन्द बुरे लोगों की बुराई पर ख़ामोश रहकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई करते हैं। ज़ियारते वारिसा में तीन लानतो में दो तो समझ में आती थी लेकिन तीसरी से आज आशना हुये। उन पर अल्लाह की लानत जिन्होंने ज़ुल्म किया दूसरे उनपर लानत जिन्होंने ज़ुल्म करते देखा तीसरी लानत किसके लिये इसका मफ़हूम हम आज ज़्यादा बेहतर समझने की कोशिश कर रहे हैं। लान अल्लाहो उम्मतन समेअत बेज़ालेका व रज़ेयत बेह (उन पर भी अल्लाह की लानत हो जिन्होंने सुना और राज़ी रहे)

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