हम न केवल सोशल मीडिया पर, बल्कि वास्तविक जीवन में भी दूसरों से अपनी तुलना करते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक चिंता है जो बचपन से शुरू होकर मानसिक शांति को खत्म करती है। भारतीय समाज में शिक्षा, करियर, शादी आदि में लगातार तुलना की जाती है, जिससे आत्म-सम्मान कम होता है और तनाव बढ़ता है।
आजकल हम अक्सर सुनते हैं कि सोशल मीडिया की वजह से हम अपनी तुलना दूसरों से करने लगे हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिना सोशल मीडिया के भी यह समस्या कितनी गहरी है? अक्सर हम अपने दोस्तों, पड़ोसियों या सहकर्मियों से अपनी तुलना करते रहते हैं। इसे कम्पेरिजन फटीग (Comparison Fatigue) कहा जाता है।
इस बारे में प्रो. हरीसा भट्ट (सीएचएमआर, इंस्टीट्यूट ऑफ गुड मैनुफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज, इंडिया) बताते हैं कि यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक चिंता है जो धीरे-धीरे हमारे मानसिक सुकून को दीमक की तरह खा रही है।
बचपन से शुरू होता है तुलना का खेल
भारतीय समाज में तुलना की जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां अक्सर बचपन से ही बच्चों को आंका जाने लगता है। चाहे वह स्कूल के नंबर हों, कॉलेज हो या फिर करियर की शुरुआत। जैसे ही आप थोड़े बड़े होते हैं, तो सवाल आपकी कमाई, शादी और परिवार तक पहुंच जाते हैं।
अक्सर पारिवारिक समारोहों, सामाजिक कार्यक्रमों या दफ्तर की बातचीत के दौरान अनजाने में ही सही, लेकिन तुलना शुरू हो जाती है। ‘शर्मा जी की बेटी का पैकेज देखा?’ या ‘वर्मा जी के बेटे की शादी तो विदेश में हुई है’, ऐसी बातें सुनकर मन में खुद के पिछड़ने का अहसास होने लगता है। धीरे-धीरे, ये छोटी-छोटी बातें हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने लगती हैं।
मन पर पड़ता है गहरा दबाव
मनोवैज्ञानिक रूप से, लगातार खुद को दूसरों की तराजू पर तौलना दिमाग को हमेशा दबाव में रखता है। जब हमारा ध्यान सिर्फ इस बात पर होता है कि दूसरों के मुकाबले हमारी जिंदगी कैसी दिख रही है, तो हम अपनी खुद की मेहनत और प्रोग्रेस को नजरअंदाज कर देते हैं।
यह आदत धीरे-धीरे तनाव को जन्म देती है। इंसान का आत्म-सम्मान कम होने लगता है और उसे हमेशा यह लगता रहता है कि उसमें कोई कमी है। भले ही आपकी जिंदगी सही दिशा में आगे बढ़ रही हो, लेकिन दूसरों से तुलना करने पर आपको अपनी उपलब्धियां भी छोटी लगने लगती हैं।
हर किसी की कहानी अलग है
हमें यह समझना होगा कि दो लोगों की जिंदगी कभी एक जैसी नहीं हो सकती। हर किसी की परवरिश, स्वास्थ्य, अवसर और निजी जिम्मेदारियां अलग-अलग होती हैं। किसी को विरासत में सुविधाएं मिलती हैं, तो किसी को शुरू से शुरुआत करनी पड़ती है।
जब परिस्थितियां अलग हैं, तो नतीजे एक जैसे कैसे हो सकते हैं? लेकिन समाज का दबाव ऐसा होता है कि वह हर किसी से एक ही समय पर एक जैसे परिणामों की उम्मीद करता है। यह उम्मीद ही गैरजरूरी तनाव और भावनात्मक थकान का कारण बनती है। यह सोचना कि उसके पास यह है, तो मेरे पास क्यों नहीं?, सिर्फ दुख देता है।
अपनी सफलता के पैमाने खुद तय करें
मानसिक शांति पाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप सफलता को अपने नजरिए से देखें, न कि दूसरों की नजरों से। आपकी खुशी और संतोष आपकी अपनी वैल्यूज पर आधारित होना चाहिए।
याद रखें, समय सबके लिए एक जैसा नहीं चलता। किसी को सफलता जल्दी मिलती है, तो किसी को थोड़ा वक्त लगता है। अपनी यात्रा का सम्मान करें। जब आप अपनी तुलना दूसरों से करना बंद कर देते हैं और अपनी रफ्तार से चलते हैं, तभी आप मानसिक रूप से स्वस्थ और खुश रह सकते हैं।





