कौआ कान ले गया, कौआ कान ले गया…

वक़ार रिज़वी
कौआ कान ले गया, कौआ कान ले गया कौए की पीछे सब भागे लेकिन अपना कान कोई देखने को तैयार नहीं। अभी दो दिन पहले एक $फतवा सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। $फतवे की मुक़ाले$फत करने वालों के खि़ला$फ तो बहस ख़ूब चली कि मुक़ाले$फत करने से पहले तहक़ीक़ कर लेनी चाहिये थी, इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिये थी, देवबंद तो रमज़ान के एक महीने बंद रहता है वग़ैरा वग़ैरा, लेकिन $फतवा आया कहां से, इतने बड़े बड़े अख़बारों ने बिना तहक़ीक़ के इसे इतनी जलीं हर$फो में शाया कैसे किया इसपर सभी की ज़बानों पर ताला लगा हुआ है किसी ने इन अख़बारों से नहीं पूछा कि इतनी शरअंगेज़ ख़बर आपने किस बुनियाद पर शाया की, अरे हिन्दी वालों से नहीं पूछ सकते थे तो उन उर्दू अख़बारों से ही पूछते कि आपके ही आफि़स में आपके ही हिन्दी एडीशन में इतनी शरअंगेज़ फज़ऱ्ी ख़बर कैसे शाया हुई।
दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है। हम पर दहशतगर्दी का इल्ज़ाम इसलिये नहीं है कि हम दहशतगर्द हैं बल्कि इसलिये है कि हमने दहशतगर्दी की वारदात सुनी और हम मज़म्मत करने के बजाये तहक़ीक़ करते रह गये कि अस्ल वाकय़ा क्या है और समझने वालों ने हमारी ख़ामोशी को हमारी रज़ामंदी समझा। पाकिस्तान में सिपाये सहाबा जैसी तमाम तंज़ीमें के नाम से अक्सर और बेशतर ख़बरें आती रहती हैं कि आज वहां मस्जिद में बम फटा और नमाज़ी शहीद हो गये, आज वहां जुलूस में बम फटा, इतने लोग शहीद हो गये आज दाईश ने इतने लोगों के सर काट लिये आज अबुबकर बगदादी ने खि़लाफ़त का एलान कर दिया, वग़ैरा वग़ैरा। हम सुनते हैं और ख़ामोश रहते हैं, क्योंकि हमारी तहक़ीक़ कभी मुकम्मल ही नहीं होती।
हो सकता है यह सब सिरे से झूठ हो, न अबुबकर बागदादी नाम का कोई शख़्स हो और न मुल्ला उमर, न पकिस्तान में मस्जिदों में बम दाग़े जाते हों न जूलूसों पर गोलियां चलती हों, लेकिन सवाल यह है कि यह ख़बरें आती कहां से हैं? कौन है जो इतने अफ़साने हर रोज़ गढ़ केअख़बार और चैनलों की र्सुिखय़ां बना देता है? आखिऱ इतनी मेहनत किसलिये और किसके लिये? इसका शायद एक ही जवाब हो कि मुक़ालिफ़ ताक़ते नहीं चाहती कि मुसलमानों में इत्तेहाद हो। ठीक है मुक़ालिफ़ नहीं चाहता कि इत्तेहाद हो लेकिन हम तो चाहते हैं कि मुसलमानों में इत्तेहाद हो, इसलिये हमनें बिना देरी किये मुक़ाले$फत करके यह बता दिया कि यह फ़तवा अगर फज़़ी न भी कऱार पाता तो भी हम ऐसे ही इसकी मुक़ाले$फत करते।
इस $फजऱ्ी $फतवे से मुसलमानों के दो $िफरक़ों के बीच दूरियां पैदा करने की कोशिश इसलिये नाकाम हो गयी क्योंकि जैसे ही सोशल मीडिया पर यह फ़तवा आया वैसे ही हक़ पसन्दों ने इसकी धज्जियां उड़ा दीं। इस $फतवे के खि़लाफ़ अपनी तमाम मसरू$िफयत होने के बावजूद उन्होंने एहतिजाजन शियों के यहां जाकर रोज़ा अ$फतार करके बता दिया कि अब मौलवियों के बहकावे में क़ौम नहीं आने वाली।
यह $फतवा इतनी जल्दी $फजऱ्ी इसलिये कऱार पा गया क्योंकि इसकी $फौरन से बेशतर शदीद मुक़ाले$फत हुई और मुक़ाले$फत उस $िफरक़े से हुई जिस $िफरक़े से यह $फतवा आया था। मुक़ाले$फत करने वालों ने इस बात में वक़्त ज़ाया नहीं किया कि इस बात की तसदीक़ कर ली जाय कि यह $फतवा वाक़ई में दारूल उलूम देवबंद से जारी हुआ है या नहीं, और इसकी ज़रूरत भी नहीं थी क्योंकि बेशतर को यह मालूम था कि देवंबंद इतने बचकाने और ग़ैरजि़म्मेदारी का सबूत नहीं दे सकता फिर भी इसकी मुक़ाले$फत इसलिये ज़रूरी थी कि जिसने जिस मक़सद से इस $फतवे को मुल्क के बड़े अख़बारों में शाया कराया उसके मंसूबों पर पानी फिर जाये, और ऐसा ही हुआ भी । मेरी दरख़्वास्त उन लागों से है कि जो कह रहे हैं कि इस $फतवे की मुक़ाले$फत करने में बहुत जल्दी की गयी उनसे ग़ुज़ारिश है कि वह उन अख़बारों के खि़ला$फ आवाज़ उठाने में कितना वक़्त लेंगें जिन्होंने इस $फतवे की बिना तहक़ीक़ किये इसे शाया किया।





