रोज़ा अफ़्तार आज शाम 4 बजे?
वक़ार रिज़वी

मिश्रा जी, शुक्ला जी, गुप्त जी, तिवारी जीं, यादव जी, मौर्या जी, श्रीवास्तव जी को ही जब रोज़ा अफ़्तार के लिये बुलाना है तो फिर वक़्त की क़ैद क्यों। उनका रोज़ा 6 बजकर 59 मिनट पर खुले या 4 बजे, क्या $फ$र्क पड़ता है। उन बेचारों से तो जब आप कहेंगें कि रोज़ा खोलिये तो वह $फौरन सर पर टोपी लगाकर कंधे पर अंगौछा डालकर बक़ायदा खजूर खाकर अपना रोज़ा खोल लेंगें। इसलिये वह हजऱात जो रोज़ा अ$फतार इन्हीं हजऱात के साथ करने में $फख़्र समझते हैं या इन्हें अपने यहां बुलाकर रोज़ा अ$फ्तार कराते हैं और फिर $फख़रिया अख़बारों में $फोटो भी छपवाते हैं उनसे ग़ुज़ारिश है कि अगर रोज़ा अ$फतार इन्हीं मिश्र जी, शुक्ल जी को ही कराना है तो इसका वक़्त 4 बजे रख लें तो क्या हर्ज है ऐसे में इन सब को रोज़ा अ$फतार कराने का मक़सद भी पूरा हो जायेगा और हक़ीक़ी रोज़ेदार अपना रोज़ा मस्जिद में रोज़ेदारों के साथ भी खोल सकेंगें।
इस्लाम के यह चार अहकाम नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात हर मुसलमान पर $फजऱ् हैं। तीसरे दर्जे पर फ ़ायज़ हज के मोक़ाम मक्का-ए-मोअज़्ज़मा में किसी ग़ैर मुंिस्लम के आने पर मुमानियत है। पहले दर्जे की इबादत नमाज़ में अभी तक हमनें नहीं देखा कि किसी ग़ैर मुस्लिम को शामिल किया गया हो फिर रोज़ा अफ़्तार में ही सब इतने सेक्यूलर क्यों हो गये जबकि रोज़ा भी ख़ालिस इबादत है नमाज़ और हज की तरह। रमज़ान अल्लाह का महीना है। इस महीने की इबादत का सवाब बाक़ी महीनों की इबादत से कहीं ज़्यादा है, बशर्ते आपकी इबादत में कोई मर्क शामिल न हों आपकी इबादत दुनियां के लिये नही बल्कि ख़ालिस अल्लाह के लिये हो। रोज़ेदारों को रोज़ा खुलवाना निहायत सवाब है आपके रोज़ा अफ़्तार पार्टी में हर वह रोज़ेदार है जिसके बारे में आपको यक़ीन है कि यह रोज़ेदार नहीं है जैसे मिश्र जी या तिवारी जी। जब यह हमारी दावत पर हमारे यहां हमारे साथ हमारी ही तरह रोज़ा अ$फतार करते हैं तो देखने वाले दिल ही दिल में मुस्कराते हैं कि मेज़बान और मेहमान अपने दुनियांवी $फायदे के लिये कैसे एक दूसरे को बेवक़ू$फ बना रहें हैं। सियासी रोज़ा अ$फतार शुरू हो गये हैं यह सरकारी पैसे से भी होंगें जो पूरे सूबे की अवाम का पैसा है और यक़ीनी तौर पर इसमें सारी अवाम की रज़ामंदी नहीं। इन सबसे बेख़बर हमारे तमाम मौलवी मस्जिदों को वीरान करके इनकी महफि़लों को आबाद करेगें।
जिस समाज में हम रहते हैं वहां एक दूसरे से दूर रहे यह मुमकिन नहीं, कारोबारी हैं, सियासत दां हैं तो एक दूसरे से मेल जोल बढ़ाना लाज़मी है, एक दूसरे की तकऱीब में हिस्सा लेना भी ज़रूरी है, लेकिन हम एक दूसरे की किसी इबादत का मज़ाक़ नहीं उड़ा सकते, जैसे हम उनके यहां होली की रात होने वाली पूजा में शामिल नहीं होते लेकिन दूसरे दिन होली ज़रूर उनसे मिलते हैं, दीवाली की पूजा साथ नहीं करते लेकिन दीवाली की मिठाई ज़रूर खाते हैं वैसे ही रोज़ा अ$फतार हम मस्जिदों में करें, लेकिन ईद सबके साथ मनायें। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने इसका आग़ाज़ किया कि राष्ट्रपति भवन में रोज़ा अ$फतार नहीं होगा, मोदी और योगी ने भी इस परम्परा का पालन किया यह सब मुबाकरबाद के हक़दार हैं कि इन्होंने अपनी सियासत चमकाने का रास्ता मज़हब नहीं चुना।





