लखनऊ, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विद्युत विभाग के 5 महानगरों तथा 7 जिलों की वितरण व्यवस्था निजी कम्पनियों के हाथों में सौपें जाने के निर्णय के खिलाफ समस्त संगठन लामबंद हो गए हैं जिससे निश्चित ही प्रदेश की विद्युत व्यवस्था चरमरा सकती है।

विद्युत कार्यालय सहायक संघ के प्रदेश अध्यक्ष सुनील प्रकाश पाल ने वृन्दावान बिजली कार्यालय पर कर्मचारियों एवं उपभोक्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि उदारीकरण के इस दौर में निजीकरण की जो आंधी उत्तर प्रदेश में चल रही है उसकी चपेट में विद्युत विभाग भी आ चुका है। पूर्व में विद्युत परिषद् को तोड़कर निगम बनाने, फिर इन निगमों को उत्पादन, वितरण व पारेषण के रूप में तोड़ने और अब 5 महानगरों एवं 7 जनपदों को किस्तों में निजी हाथों में देने की प्रक्रिया चल रही है। निजी क्षेत्र जब बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का जिम्मा उठाता है तो उसके लिए सामाजिक लक्ष्य हासिल करना कोई जिम्मेदारी नहीं होती उनका एकमात्र उद्देश्य इससे लाभ कमाना होता है चाहें उसके लिए उपभोक्ताओं का गला ही क्यों न काटना पड़े। विद्युत विभाग बुनियादी आवश्यकताओं और समाज के विकास से सीधे जुड़ा क्षेत्र है और यह कम्पनियां अपने वर्चस्व का दुरूपयोग कर उपभोक्ताओं से अतिरिक्त वसूली ही करेंगी इसलिए बिजली के निजीकरण का फैसला न तो जनहित में है और न ही कर्मचारी अथवा उद्योग हित में। प्रबन्धन अपनी अक्षमता छिपाने और निजी कम्पनियों को गलत तरीके से फायदा पहुंचाने के लिए इन शहरों की विद्युत आपूर्ति का काम निजी कम्पनी को दे रही है।
मीडिया प्रभारी राजेन्द्र विक्रम ने कहा इस निजीकरण से आम जनता को भारी नुकसान तो होगा ही वहीं निजी कम्पनियों अंकुश नहीं होने से भारी परेशानियों का सामना भी करना पड़ेगा।
बैठक जिला पदाधिकारियों में जय प्रकाश गुप्ता, महेश यादव, वीरेन्द्र कुमार सहित तमाम उपभोक्ता भी मौजूद रहे जिन्होंने निजीकरण का विरोध किया।

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