पेंशन संबंधी कार्यवाही पूरा करना सेना का बाध्यकारी कर्तव्य: विजय कुमार पाण्डेय

राईफलम-मैंन (स्वर्गीय) संतोष कुमार की पत्नी श्रीमती आशा सिंह को सेना कोर्ट के न्यायमूर्ति एस.वी.एस.राठौर ने सेना मुख्यालय के आदेश को निरस्त करके पारिवारिक पेंशन प्रदान की । प्रकरण यह था कि मोहनलालगंज, लखनऊ निवासिनी श्रीमती आशा सिंह के पति राईफलम-मैंन (स्वर्गीय) संतोष कुमार राजपुताना रायफल में वर्ष 8 जनवरी, 1999 में भर्ती होकर 7 मई, 2007 को 15 दिन के आकस्मिक-अवकाश पर अपने पैत्रिक निवास आए थे उसके बाद जून 2007 को राजपुताना राईफल, नई दिल्ली उपस्थित हुआ लेकिन सेना द्वारा सर्विस ज्वाईन नहीं करने दिया गया पुनः अपनी पत्नी के साथ जून 2007 में तो उसे बताया गया कि तुम्हे सेना-मुख्यालय द्वारा भगोड़ा घोषित कर दिया गया है, 9 अप्रैल, 2008 को सडक दुर्घटना में मृयु हो गई, पत्नी ने पेंशन की मांग की तो सेना-ध्यक्ष द्वारा यह बताकर उसकी मांग को मनमाने तरीके से ख़ारिज कर दिया कि भगोड़े सिपाही की पत्नी पेंशन नहीं मिल सकती उसके बाद ने वर्ष 2016 में सेना कोर्ट लखनऊ का दरवाजा खटखटाया l याचिनी के अधिवक्ता शैलेन्द्र कुमार सिंह और आशीष कुमार सिंह ने जोरदार बहस करते हुए थलसेनाध्यक्ष के आदेश को सेना कोर्ट चेन्नई के निर्णय श्री जी.यशु पद्म बनाम मद्रास इंजीनियर ग्रुप और माननीय दिल्ली उच्च-न्यायालय के निर्णय श्रीमती हरमंदि बनाम भारत सरकार, पैरा-212, सेना पेंशन रेगुलेशन, 1961 और पैरा-376 सेना सर्विस रेगुलेशन, 1987 (vol-1) के आलोक में गैर-वैधानिक बताया लेकिन सेना के अधिवक्ता आर.सी.शुक्ला ने मानने से इंकार किया लेकिन कोर्ट ने सिरे से ख़ारिज कर दिया l
ए.ऍफ़.टी.बार एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी विजय कुमार पाण्डेय ने बताया याचिनी के अधिवक्ता की दलील सुनने के बाद न्यायमूर्ति ने कहा कि जब याचिनी का पति उपस्थित हुआ तो सेना द्वारा ज्वाईन कराना बाध्यकारी था सेना के रुल, रेगुलेशन इस बात का प्रावधान करते हैं कि यदि आत्म-हत्या का मामला भी हो तो पारिवारिक पेंशन देने से इनकार नहीं किया जा सकता l विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि कोर्ट ने इस प्रकरण में सेना द्वारा न तो बर्खास्त किया गया और न ही डिस्चार्ज ऐसे में उसे डियूटी पर ही माना जाएगा यदि याचिनी का पति भगोड़ा था तो सेना ने कोई कार्यवाही क्यों नहीं की यदि ऐसा नहीं किया तो पेंशन न देने का आदेश बेमानी है l कोर्ट ने कहा कि सेना की गलतियों का खामियाजा सिपाही और उसकी पत्नी नहीं भुगत सकते सेना का बाध्यकारी कर्तव्य था कि वह प्रयास करके पेंशन संबंधी कार्यवाही पूरा करती लेकिन उसने ऐसा नहीं किया जो कि याचिनी और उसके पति के साथ अन्याय है और सेनाध्यक्ष के आदेश को ख़ारिज करते हुए नौ प्रतिशत व्याज के साथ पति की मृत्यु की तिथि से पारिवारिक-पेंशन पत्नी को दिए जाने का आदेश दिया l निर्णय अन्य मामलों में भी राहत प्रदान कराने में अन्य पीड़ित सैन्य-कर्मियों के लिए भी लाभकारी होगा l
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