हजारों एमबीबीएस छात्र विदेशी लाइसेंसिंग परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि उनके कॉलेजों के पास वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मेडिकल स्कूल्स में ECFMG स्पॉन्सर नोट नहीं है। यह नोट संस्थान के ECFMG मापदंडों को पूरा करने की पुष्टि करता है।
एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बावजूद भी हजारों छात्र विदेशी लाइसेंसिंग परीक्षा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। क्योंकि जिन भी छात्रों ने अपने संस्थान से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की है। उन संस्थानों ने वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मेडिकल स्कूल्स में ECFMG स्पॉन्सर नोट की प्रक्रिया को पूरा नहीं किया है।
आपको बता दें, यह एक ऐसा स्पॉन्सर नोट होता है। जो यह बताता है कि संस्थान ECFMG के सभी मापदंडो को पूरा करती है। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के सभी मेडिकल कॉलेज की सूची तैयार करना है, जिन्हें सरकार की ओर से मान्यता दी गई है।
कॉलेज कैसे करते हैं अप्लाई
जिन भी मेडिकल संस्थान के पास ऐसे स्पॉन्सर नोट होते हैं। उस मेडिकल संस्थान के छात्र ECFMG सर्टिफिकेशन के लिए योग्य होते हैं। बता दें, कॉलेज अपने ग्रेजुएट के पहले बैच के बाद या फिर पहले बैच के एडमिशन के 5 साल बाद क्रेडेंशियल वेरिफिकेशन के लिए ऑनलाइन माध्यम से अप्लाई कर सकते हैं।
विदेशी लाइसेंसिंग परीक्षा के लिए योग्यता
अधिकतर मेडिकल कॉलेज यह प्रक्रिया तब शुरू करते हैं। जब उनका कॉलेज पहले बैच के 12 महीने बाद मेडिकल इंटर्नशिप का संचालन करता है। लेकिन अमूमन छात्रों को इस पूरी प्रक्रिया के बारें में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद पता चलता है कि उनके कॉलेज के पास ECFMG स्पॉन्सर नोट्स ही नहीं है। छात्र जब USMLE, यूके के PLAB या अन्य लाइसेंसिंग परीक्षा में शामिल होते है, तब उन्हें पता चलता है कि संस्थान के पास विदेशी लाइसेंसिंग परीक्षा में शामिल होने के लिए स्पॉन्सर नोट्स नहीं है।
हरियाणा के करनाल में कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज स्थित है। इस संस्थान से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने वाले अधिकतर छात्रों को बाद में पता चला कि उनके कॉलेज के पास ECFMG स्पॉन्सर नोट्स नहीं हैं। हालांकि इस कॉलेज ने अपना पहला बैच साल 2017 में ही शुरू कर दिया था। इसके अलावा, एम्स के कुछ लोगों को भी ईसीएफएमजी स्पॉन्सर नोट्स प्राप्त नहीं हुए हैं।





