शहादत ए इमाम हुसैन की दास्तां सुनकर हर आंख हुई नाम
अमरोहा अवधनामा संवाददाता अज़ादारी और मजालिस का सिलसिला अपनी पूरी रवायती अक़ीदत और ग़मगीन माहौल के साथ जारी है। इसी कड़ी में शहर के विभिन्न इमामबाड़ों में ‘मजलिस शाम-ए-गरीबां’ का बेहद पुरअसर एहतमाम किया गया। यौम-ए-आशूरा (10 मुहर्रम) की ढलती शाम को कर्बला के भूखे-प्यासे शहीदों और उनके बेसहारा बचे ख़ानदान पर ढाए गए ज़ुल्म की याद में पूरा शहर ग़म के साए में डूब गया। मोमीन ने मोमबत्तियां जलाकर और तारीकी (अंधेरे) के बीच बैठकर कर्बला की उस भयानक रात को याद किया, जब इमाम हुसैन की शहादत के बाद यज़ीदी फ़ौज ने अहले-बैत के ख़ैमे जला दिए थे।
इस सिलसिले में मुख्य मरकज़ी मजलिस इमाम बारगाह मैमूना खातून में आयोजित हुई, जिसमें सलीम अमरोहवी और ब्राद्रान ने सलाम पेश किया। मजलिस के बाद नौहाख़्वानी हुई बेहद पुरअसर अंदाज़ में सीना ज़नी (छाती पीटकर मातम करना) की। मातम के वक़्त पूरा इमामबाड़ा ‘या हुसैन’ की सदाओं से गूंज उठा। अंजुमन के नौजवानों और बुज़ुर्गों ने जिस शिद्दत के साथ सीना ज़नी की, उसने वहाँ मौजूद हर शख़्स के दिल को झकझोर कर रख दिया।
इमाम बारगाह मैमूना खातून में आली जनाब मौलाना कामरान हैदर साहब ने मजलिस को ख़िताब किया। मौलाना ने अपने बयान में कर्बला के वाक़यात, इमाम हुसैन की अज़ीम क़ुर्बानी और मैदान-ए-जंग में उनके सब्र का बहुत ही मर्मस्पर्शी ज़िक्र किया। जैसे ही मौलाना कामरान हैदर ने इमाम हुसैन की शहादत के आख़िरी लम्हों का मसायब पढ़ना शुरू किया, इमामबाड़े में मौजूद अज़ादारों की आँखों से आँसू का समंदर बह गया। हर तरफ़ से चीख़-ओ-पुकार और रोने की आवाज़ें आने लगीं, जिससे माहौल पूरी तरह ग़मज़दा हो गया।
ग़म-ए-हुसैन का यह मंज़र सिर्फ़ एक जगह तक सीमित नहीं था, बल्कि शहर के अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर भी ऐसी ही रूहानी शमा रोशन थी। इमाम बारगाह नूरन और दरबार शाह अबुल हसन में भी मजलिस-ए-शाम-ए-गरीबां का बड़ा और पुरअसर आयोजन हुआ। इन दोनों ही मुक़द्दस मक़ामात पर ज़ाकिर-ए-अहले-बैत मौलाना रज़ा अली रजन साहब ने मजलिस को ख़िताब किया। मौलाना रज़ा अली ने अपने मख़्सूस और दर्दभरे अंदाज़ में इमाम हुसैन की शहादत के बाद बीवी ज़ैनब और बच्चों पर टूटे पहाड़ों और उनकी कै़दी बनाकर ले जाए जाने की दास्तान बयान की।
मौलाना रज़ा अली रजन के ख़िताब को सुनने के लिए हज़ारों की तादाद में अज़ादार दरबार शाह अबुल हसन और इमाम बारगाह नूरन में जमा हुए थे। मजलिस के ख़त्म होने पर रिवायती तौर पर अंधेरा कर दिया गया और अज़ादारों ने ज़मीन पर बैठकर ख़ाक-नशीं होकर मजलिस में हिस्सा लिया। अमरोहा की यह शाम-ए-गरीबां एक बार फिर इंसानियत, हक़ और इंसाफ़ के लिए दी गई इमाम हुसैन की उस अज़ीम क़ुर्बानी की याद ताज़ा कर गई, जो सदियों बाद आज भी हर दिल में ज़िंदा है।





