यक़ीन, सब्र और हिम्मत — यही है फतह का असली राज़
आलम रिज़वी

इस्लामी इतिहास में जंगे खैबर एक अहम मुकाम रखती है। यह वह जंग थी जिसमें सब्र, हिकमत और यकीन ने आखिरकार फतह दिलाई। रिवायतों के मुताबिक, जब यह जंग लंबी खिंच गई और कई दिन गुजर गए जब किसी को इस बात का यकीन नहीं था कि यह जंग मुसलमान जीतेंगे तो उस वक्त भी सब्र हिकमत अमली और सुपर पावर अल्लाह पर यकीन रखा गया और अल्लाह ने 40 वें दिन फतह और कामयाबी दिलवा कर यह बता दिया की अल्लाह से बड़ी कोई ताकत नहीं है। कल भी अली (अ.स.) की कयादत में खैबर फतह हुआ था और आज भी अली ही की कयादत में खैबर फतह हुआ।

मौला अली का मशहूर जुमला इतिहास में आज भी गूंजता है:
“खैबर का दरवाज़ा मैंने अपनी ताक़त से नहीं, बल्कि अल्लाह की मदद से उखाड़ा।”
आज के दौर में जब हम ईरान और अमेरिका के बीच हालिया तनाव को देखते हैं, तो कहीं न कहीं इतिहास की वही झलक दिखाई देती है। 39 दिनों तक चले इस तनाव और टकराव ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। हर दिन हालात बदलते रहे, बयानबाज़ी तेज़ होती रही, और जंग का खतरा मंडराता रहा।
लेकिन 40वें दिन जो हुआ, उसने एक नया मोड़ दिया। डोनाल्ड ट्रंप का बातचीत और समझौते के लिए तैयार होना इस बात की निशानी माना जा रहा है कि हालात ने अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर किया।
इस पूरे घटनाक्रम को कई लोग एक प्रतीक के रूप में देख रहे हैं जैसे जंगे खैबर में सब्र और यकीन के बाद फतह मिली, वैसे ही ईरान ने भी अपने उसूलों पर कायम रहते हुए दुनिया को यह संदेश दिया कि दबाव के आगे झुकना उसकी फितरत नहीं।
ईरान की यह मजबूती सिर्फ सैन्य ताकत नहीं, बल्कि उसकी सियासी और वैचारिक स्थिरता का भी प्रतीक है। दूसरी ओर, अमेरिका का रुख बदलना यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में हर ताकत को कभी न कभी हकीकत का सामना करना पड़ता है।
हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि आज की दुनिया में जंग किसी भी मसले का हल नहीं है। खैबर की फतह हमें यह भी सिखाती है कि जीत सिर्फ तलवार से नहीं, बल्कि यकीन, सब्र और सही कियादत से मिलती है।
ईरान और अमेरिका के बीच यह टकराव सिर्फ दो मुल्कों की कहानी नहीं, बल्कि यह बताता है कि इतिहास खुद को अलग-अलग शक्लों में दोहराता है। जंगे खैबर की तरह, यहां भी आख़िरकार फैसला ताक़त के साथ-साथ हौसले सब्र और यकीन का हुआ।





