पहले सांसों के लिए और अब पेट के लिए, सिलेंडर की मारामारी।
गैस एजेंसियों में लंबी-लंबी कतारें, रसोई में सन्नाटा।
कानपुर। देश के अंदर एक बार फिर सिलेंडर चर्चा में है। हर कोई सिलेंडर को लेकर चिंतित है। समय वही है, महीनें और तारीखें वही हैं, बदला है तो सिर्फ और सिर्फ सिलेंडर ने अपना रूप। कोरोना काल में ऑक्सीजन सिलेंडर की मारा-मारी थी, इस वक्त एलपीजी सिलेंडर की। उस वक्त लोग सांसों के लिए सिलेंडर का जुगाड़ करते दिखते थे, और आजकल पेट के लिए।
गैस एजेंसियों पर भटक रहे लोग, लंबी लाइनों में कहीं ख़ुशी कहीं गम…
एकाएक आई रसोई गैस की किल्लत ने लोगों के सामने संकट ला दिया। अधिकांश आदमी काम धंधा छोड़कर सिलेंडर के लिए परेशान होते दिखने लगा। कारण विदेशों में होने वाला युद्ध है। जिसके चलते देश की जनता रसोई गैस की जद्दोजहद में जूझ रही। आसानी से मिलने वाला रसोई गैस सिलेंडर, आज बमुश्किल नसीब हो रहा है। गैस एजेंसियों के बाहर लोग लम्बे-लम्बे समय तक लाइन में खड़े होकर सिलेंडर पा रहे हैं। वहीं कुछ को मिल भी नहीं पा रहा है। लंबी कतारों में लगने के बाद सिलेंडर पाने वाले कुछ लोगों के चेहरे पर खुशी दिखती है, तो कुछ को मायूस होकर घर लौटना पड़ता है।
सिलेंडर की किल्लत से रसोई में सन्नाटा….
एलपीजी सिलेंडर की किल्लत से जहां होटलों, ढाबों और चाय की दुकानों में दिक्कतें दिखीं, वहीं घरों के अंदर रसोई भी सन्नाटे में है। लोग बड़ा सिलेंडर न मिल पाने के कारण दो-चार किलो गैस का जुगाड़ तक करते दिखे। कहीं कहीं होटल, ढाबे और छोटी-मोटी चाय की दुकानें बन्द करने की नौबत आई, वहीं घर में गैस न होने की वजह से लोग होटल से खाना मंगवाने पर भी मजबूर हैं। सिलेंडर की किल्लत से अब लोगों ने मिट्टी के चूल्हे और अंगीठी का भी जुगाड़ करना शुरू कर दिया है।





