यूपी के 17 अतिपिछड़े जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की सांसद ने रखी मांग
चन्दौली । भाजपा सांसद डॉ विनोद बिंद ने लोकसभा सदन में महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश की 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग रखी । उन्होंने कहा कि यह केवल एक राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि करोड़ों वंचित, शोषित और पिछड़े समाज के सम्मान, अधिकार और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने लोकसभा सदन में कहा कि बिंद, कश्यप, निषाद, कहार, प्रजापति, विश्वकर्मा, केवट, मल्लाह, प्रजापति, राजभर, भर, धीवर, बाथम, तुरहा, गोंड़िया, मांझी, और मछुआ आदि 17 अतिपिछड़े जातियों के सम्मान, अधिकार और उसका भविष्य जुड़ा हुआ है । ये जातियां केवल नाम ही नही है ये भारत की आत्मा, श्रम संस्कृति और हमारी परंपरा का जीवित प्रतीक है । ये जातियाँ आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़ी हुई हैं। इन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा देकर ही इनके जीवन में वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है।
सांसद डॉ बिंद ने कहा कि ओबीसी वर्ग की कुछ संपन्न जातियां आरक्षण का अधिकांश लाभ उठा लेती हैं, जबकि अत्यंत पिछड़ी जातियां पीछे रह जाती हैं और उन्हें आरक्षण का लाभ नही मिल पता है साथ ही साथ उन्हें केंद्रीय सरकारी योजनाओं का भी लाभ नही उठा पाते है । उन्होंने सदन में प्रश्न उठाते हुए कहा कि एक ही समाज, एक ही जीवन शैली और एक ही संघर्ष तो इन सबका अधिकार अलग अलग क्यों? ये सभी जातियां कई प्रदेशो में अनुसूचित जाति में है यहां तक कि दिल्ली में भी अनुसूचित जाति में है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में ओबीसी जाति में रखा गया है।
उन्होंने डॉ श्याम प्रसाद मुखर्जी को कोट करते हुए कहा कि डॉ मुखर्जी जी कहते थे कि एक देश, एक विधान और एक प्रधान तो 17 अतिपिछड़े जातियों के साथ भेदभाव क्यो? भदोही सांसद डॉ विनोद बिंद ने सभी 17 अतिपिछड़े जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के लिए लोकसभा पटल पर अपनी मांग रखते हुए कहा कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नही होती तब तक इसके लिए विशेष आरक्षण का प्रावधान किया जाय। भाजपा सांसद ने कहा कि ओबीसी वर्ग की कुछ संपन्न जातियां आरक्षण का अधिकांश लाभ उठा लेती हैं, जबकि अत्यंत पिछड़ी जातियां पीछे रह जाती हैं और उन्हें आरक्षण का लाभ नही मिल पता है जिसके चलते ये केंद्रीय सरकारी योजनाओं का भी लाभ नही उठा पाते है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस मांग पर गंभीरता से विचार कर शीघ्र निर्णय लिया जाए, ताकि सामाजिक न्याय की भावना साकार हो सके। और वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे इन समाज के लोगों को उनका अधिकार मिले और उन्हें मुख्यधारा में लाने का रास्ता प्रशस्त हो।





