सात देशों के तीस से अधिक विदेशी विद्वान शामिल हुए,103शोध पत्र पढ़े गए
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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में पालि भाषा और साहित्य पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हो गया है। समापन समारोह में पालि भाषा एवं बौद्ध विरासत के संरक्षण और प्रचार प्रसार के संदेश दिए गए और डिजिटल और आनलाइन प्लेटफार्मों के एकीकरण पर जोर दिया गया।
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के कला संकाय स्थित पालि एवं बौद्ध अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन वैदिक विज्ञान केंद्र में हुआ। ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में पालि भाषा एवं साहित्य के योगदान’ विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में कुल 103 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
सात देशों से लगभग 30 से अधिक विदेशी विद्वानों ने सहभागिता की, जिनमें जापान से 21 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल विशेष रूप से उपस्थित रहा। सम्मेलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संग्रहण, वर्चुअल पर्यटन और ऑनलाइन मंचों के माध्यम से पालि भाषा एवं बौद्ध विरासत के संरक्षण और वैश्विक प्रसार पर विशेष चर्चा की गई।
मुख्य अतिथि प्रो. राजेश रंजन, कुलपति, केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान, लद्दाख ने भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्स्थापन पर बल देते हुए सम्मेलन की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की। विशिष्ट अतिथि प्रो. तोमोयूकी यामाहाता, होक्काइडो विश्वविद्यालय, जापान ने पालि और जापानी भाषा के संबंधों पर प्रकाश डाला।
समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. उमाशेकर व्यास ने इसे पालि की सकारात्मक वैश्विक यात्रा का प्रतीक बताया, जबकि संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने कहा कि इस प्रकार का अंतरराष्ट्रीय भाषा-केंद्रित आयोजन राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों को सशक्त करेगा।





