इटावा। हैंवरा कोठी पर हो रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन प्रवचन करते हुए उज्जैन स्थित महामृत्युंजय मठ महाकाल लोक के पीठाधीश्वर स्वामी श्रीप्रणवपुरी महाराज ने कहा कि ज्ञान प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन संतों का संग है,जीव जब तक उनके चरणों की रज नहीं लेता,उसे तत्व ज्ञान नहीं हो सकता।ध्रुव चरित्र का वर्णन करते हुए प्रणवपुरी महाराज ने कहा कि जहां सुनीति होती है,वहां ध्रुव जैसा भक्त पुत्र जन्म लेता है,और जहां सुरुचि यानी स्वेच्छाचारिता होती है,वहां दुष्ट संतान पैदा होती है।उन्होंने आगे कहा कि उत्साहवर्धन को हतोत्साहित करना ही लक्ष्य प्राप्ति की ओर ले जाता है,जैसे बालक ध्रुव से जब नारद जी ने कहा कि तुम अभी बहुत छोटे हो,तपस्या नहीं कर पाओगे,तो ध्रुव ने उसे चुनौती के रूप में लेते हुए कठोर तपस्या की और भगवान के दर्शन पाए और वह ध्रुव जिन्हें उनके पिता उत्तानपाद ने गोद से उतार दिया था, वही सारे सैन्य साज समाज के साथ उनके स्वागत के लिए गए।
जड़ भरत के प्रसंग की तात्विक चर्चा करते हुए कहा उन्होंने कहा कि राजा रहुगण जब महाज्ञानी जड़ भरत जी से ज्ञान प्राप्ति का साधन पूछते हैं तो वह कहते हैं कि ज्ञान प्राप्ति कोई किताब आदि पढ़ लेने मात्र से नहीं हो सकता,जब तक कि संत महापुरुषों के चरणों की रज नहीं मिलती। वास्तव में संतों का संग ही ज्ञान प्राप्ति का परम साधन है।उसके बाद उन्होंने अजामिल और भक्त प्रहलाद की कथाएं सुनाकर श्रोताओं को खूब आनंद विभोर कर दिया।कथा के अंत में परीक्षित दंपति कुमुदेश चंद्र यादव,श्रीमती रमा यादव ने व्यास गद्दी की आरती की।जितेंद्र प्रताप यादव,अनुज यादव,नीरज यादव,सौरभ यादव,मुकुल यादव,नितुल,दिव्यांश, अर्पित,अमित,प्रतीक एवं सभी परिवारजनों ने प्रसाद वितरण किया। कथा 21 फरवरी तक होगी।कथा का समय दोपहर एक बजे से सायं पांच बजे तक है।





