Monday, February 16, 2026
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‘गंगनम स्टाइल’ से ‘स्क्विड गेम’ तक: भारत में कोरियाई संस्कृति की बढ़ती ताकत, बढ़ा रहा ‘सॉफ्ट पावर’

गंगनम स्टाइल से शुरू हुई दक्षिण कोरिया की सांस्कृतिक लहर (हल्ल्यू) भारत में तेजी से बढ़ रही है। के-पॉप, के-ड्रामा, के-ब्यूटी और खानपान भारतीय युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। यह ‘सॉफ्ट पावर’ का उदाहरण है, जहाँ संस्कृति के माध्यम से प्रभाव डाला जाता है। हालांकि, इसकी चमक के पीछे कठोर प्रशिक्षण और मानसिक दबाव जैसी चुनौतियाँ भी हैं। यह लहर भारत की सांस्कृतिक विविधता में एक नया अध्याय जोड़ रही है।

साल 2012 में जब गंगनम स्टाइल गाना रिलीज हुआ, तो भारत के शादियों, कॉलेज फेस्ट और टीवी पर हर जगह वही गाना सुनाई देता था। घोड़े वाली डांस स्टेप अचानक दुनिया भर में छा गई।

उस समय इसे सिर्फ एक मजेदार गाना समझा गया, लेकिन आज यह माना जाता है कि वहीं से दक्षिण कोरिया की सांस्कृतिक ताकत यानी ‘कोरियन वेव’ (Hallyu) ने दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बनानी शुरू की।

आज हालात यह हैं कि दक्षिण कोरिया सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक्स या कार बनाने वाला देश नहीं रहा। वह भारतीय युवाओं की पसंद, फैशन, खाने-पीने और मनोरंजन का हिस्सा बन चुका है। इंस्टेंट रामेन से लेकर स्किनकेयर और के-पॉप प्लेलिस्ट तक कोरिया हर जगह दिखाई देता है।

हाल ही में गाजियाबाद की तीन बहनों की आत्महत्या की घटना ने भी इस चर्चा को तेज किया। बताया गया कि वे कोरियाई ड्रामा और पॉप कल्चर की बड़ी फैन थीं। इस दुखद घटना ने कई लोगों को पहली बार यह सोचने पर मजबूर किया कि कोरिया की ‘सॉफ्ट पावर’ आखिर है क्या।

सॉफ्ट पावर क्या है?

‘सॉफ्ट पावर’ शब्द 1980 के दशक में अमेरिकी प्रोफेसर जोसेफ नाय ने दिया था। इसका मतलब है बिना दबाव या ताकत के, अपनी संस्कृति और विचारों से दूसरे देशों को प्रभावित करना।

अमेरिका ने हॉलीवुड और म्यूजिक के जरिए यह किया। दक्षिण कोरिया ने भी कुछ ऐसा ही रास्ता अपनाया। कोरियन वॉर के बाद तबाह हुआ यह देश कुछ दशकों में बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। 1996 में वह OECD का सदस्य बना। सैमसंग और ह्युंडई जैसे ब्रांड्स ने उसकी पहचान मजबूत की।

लेकिन 1990 के दशक के बाद सरकार ने फिल्मों, म्यूजिक और टीवी इंडस्ट्री को बढ़ावा देना शुरू किया। स्क्रीन कोटा, सब्सिडी और खास विभाग बनाकर ‘हल्ल्यू को बढ़ाया गया। 2021 में BTS ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण दिया।

के-पॉप से ऑस्कर तक

BTS ने कई गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए हैं। पैरासाइट ने चार ऑस्कर जीते, जिनमें बेस्ट पिक्चर भी शामिल था। नेटफ्लिक्स का स्क्वीड गेम दुनिया की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली सीरीज में शामिल हुआ।

के-पॉप ग्रुप्स जैसे BTS और ब्लैकपिंक ने ग्लोबल चार्ट्स में जगह बनाई। सोशल मीडिया के जरिए भारतीय फैंस भी लाइव इवेंट और स्ट्रीमिंग कैंपेन का हिस्सा बनते हैं। के-ड्रामाज 16-20 एपिसोड में खत्म हो जाते हैं, जो भारतीय लंबे टीवी शोज से अलग हैं। ‘Crash Landing on You’ और ‘Goblin’ जैसे शोज ने भारत में खास दर्शक बनाए।

के-ब्यूटी, के-फैशन और खाना

के-ब्यूटी प्रोडक्ट्स अब बड़े स्टोर्स में अलग सेक्शन में मिलते हैं। 2025 की पहली छमाही में दक्षिण कोरिया अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ब्यूटी प्रोडक्ट एक्सपोर्टर बन गया। ‘ग्लास स्किन’, शीट मास्क और स्नेल म्यूसिन जैसे ट्रेंड सोशल मीडिया पर वायरल हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे युवाओं पर परफेक्ट दिखने का दबाव भी बढ़ता है।

के-फैशन में सिंपल और क्लीन लुक पर जोर होता है ओवरसाइज कपड़े, ट्रेंच कोट और मिनिमल स्टाइल। वहीं, रामेन, बुलडाक नूडल्स और डालगोना कॉफी जैसे ट्रेंड भारत में भी लोकप्रिय हो चुके हैं।

क्या यह सांस्कृतिक दबदबा है?

कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मयुख लाहिड़ी मानते हैं कि कोरियाई संस्कृति लोकप्रिय जरूर हुई है, लेकिन उसने पश्चिमी संस्कृति की जगह पूरी तरह नहीं ली। दिल्ली विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर के अनुसार, जब तक लोग अपनी पसंद से यह संस्कृति अपनाते हैं, तब तक इसे ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ नहीं कहा जा सकता।

भारत जैसे विविध समाज में लोग अलग-अलग चीजें चुनते हैं। भारतीय इंडस्ट्री भी खुद को बदलती रहती है। कई भारतीय ब्रांड्स कोरियाई नाम और स्टाइल अपनाकर अपने प्रोडक्ट बेच रहे हैं।

चमक के पीछे का सच

के-पॉप और के-ड्रामा की दुनिया जितनी ग्लैमरस दिखती है, उसके पीछे उतनी ही कड़ी मेहनत और दबाव है। ट्रेनी सिस्टम, सख्त कॉन्ट्रैक्ट और सोशल मीडिया ट्रोलिंग कलाकारों पर मानसिक दबाव बढ़ाते हैं। दक्षिण कोरिया में सेलिब्रिटी आत्महत्या के कई मामले सामने आ चुके हैं, जिससे इंडस्ट्री में सुधार की मांग उठी है।

साथ ही, गोरी त्वचा और पतले शरीर जैसे ब्यूटी स्टैंडर्ड एशिया में पहले से मौजूद रंगभेद की सोच को और मजबूत कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी ट्रेंड का अति-उपभोग चिंता और असुरक्षा बढ़ा सकता है।

सॉफ्ट पावर की सीमाएं

दक्षिण कोरिया की सांस्कृतिक ताकत ने उसकी छवि मजबूत की है, लेकिन यह भू-राजनीतिक चुनौतियों को खत्म नहीं कर सकती। चीन, जापान और उत्तर कोरिया जैसे पड़ोसियों के बीच उसे संतुलन बनाना पड़ता है। फिर भी, कोरियन वेव दिखाती है कि आज दुनिया में प्रभाव सिर्फ ताकत से नहीं, आकर्षण से भी बनाया जा सकता है।

‘गंगनम स्टाइल’ से लेकर ‘स्क्विड गेम’ तक, दक्षिण कोरिया ने साबित किया है कि स्क्रीन और सोशल मीडिया के जरिए भी वैश्विक पहचान बनाई जा सकती है। भारत में यह लहर शायद प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता का नया अध्याय है।

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