Thursday, April 2, 2026
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क्या हमारी विदेश नीति सोशल मीडिया तय करेगा?

भावनाओं, नफ़रत और अधूरी जानकारी के दौर में भारत के राष्ट्रीय हित पर एक ज़रूरी बहस

— आलम रिज़वी

आज देश में किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर बात करना आसान नहीं रह गया है। लोग पहले सुनना नहीं चाहते, पहले तय कर लेते हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत। अफ़सोस की बात यह है कि अब फैसले जानकारी या देशहित के आधार पर नहीं, बल्कि भावनाओं और पहचान के आधार पर लिए जा रहे हैं। ईरान का मुद्दा इसका ताज़ा उदाहरण है।

ईरान को लेकर भारत में जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ दिखाई देती हैं, वह सोचने पर मजबूर करती हैं। कई लोग बिना पूरे हालात समझे ही किसी विदेशी कार्रवाई को सही ठहराने लगते हैं। तब यह नहीं देखा जाता कि इसका असर भारत पर क्या पड़ेगा। जबकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम को देखने का सही पैमाना यही होना चाहिए कि उससे हमारे देश के हित सुरक्षित रहते हैं या नहीं।

भारत और ईरान के रिश्ते कोई आज के नहीं हैं। यह संबंध सदियों पुराना है। व्यापार, संस्कृति और ज्ञान के ज़रिये दोनों समाज एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। हमारी भाषा, साहित्य और परंपराओं में फ़ारसी सभ्यता की झलक आज भी मिलती है। यह रिश्ता किसी राजनीतिक मजबूरी का नतीजा नहीं, बल्कि इतिहास की स्वाभाविक धारा से बना है।

वर्तमान समय में भी ईरान भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम देश है। चाबहार बंदरगाह भारत को मध्य एशिया से जोड़ने का एक अहम रास्ता है। इससे भारत को क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है और वैकल्पिक व्यापार मार्ग भी मिलता है। ऐसे में ईरान में अस्थिरता या युद्ध का माहौल भारत के हित में नहीं हो सकता।

अक्सर यह कहा जाता है कि ईरान के अंदर हालात ठीक नहीं हैं। यह बात कुछ हद तक सही भी है। वहां महंगाई है, रोज़गार की दिक्कतें हैं और आम लोग परेशान हैं। लेकिन इन हालात को सिर्फ़ अंदरूनी वजहों से जोड़कर देखना अधूरा सच होगा। लंबे समय से लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है, जिसका बोझ आम जनता को उठाना पड़ रहा है।

आज के दौर में सोशल मीडिया राय बनाने का सबसे बड़ा ज़रिया बन गया है। लेकिन यहां पूरी तस्वीर कम और आधी-अधूरी जानकारी ज़्यादा मिलती है। कुछ वीडियो, कुछ पोस्ट और कुछ सुर्ख़ियाँ पूरे देश की सोच को प्रभावित कर देती हैं। बिना जांचे-परखे किसी भी ख़बर पर यक़ीन करना हमें ग़लत दिशा में ले जा सकता है।

देशभक्ति का अर्थ किसी एक देश या समूह के ख़िलाफ़ खड़े होना नहीं होता। सच्ची देशभक्ति यह है कि हम हर मुद्दे को एक ही कसौटी पर परखें। अगर किसी देश की संप्रभुता हमारे लिए मायने रखती है, तो वही सिद्धांत दूसरों पर भी लागू होना चाहिए। यही सोच भारत को एक जिम्मेदार और सम्मानित राष्ट्र बनाती है।

भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताक़त हमेशा संतुलन और स्वतंत्र निर्णय रही है। हमने कभी आँख मूंदकर किसी का पक्ष नहीं लिया। आज भी ज़रूरत है कि हम उसी समझदारी को अपनाएँ। नफ़रत या जल्दबाज़ी में बनाई गई राय न तो देश को मज़बूत बनाती है, न ही समाज को।

ईरान का सवाल केवल एक देश का मामला नहीं है। यह हमारी सोच, हमारी समझ और हमारे लोकतांत्रिक विवेक की भी परीक्षा है।

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