सिद्धार्थनगर । डुमरियागंज तहसील के क़स्बा हल्लौर की साहित्यिक फिज़ा उस समय और अधिक सुवासित हो गई जब समकालीन उर्दू के प्रख्यात कवि ख़ुर्शीद ज़फ़र हल्लौरी के काव्य-संग्रह ‘दीवान-ए-ख़ुर्शीद ज़फ़र’ का लोकार्पण अत्यंत गरिमा और बौद्धिक वैभव के साथ संपन्न हुआ। इस प्रतिष्ठित साहित्यिक समारोह का आयोजन बज़्म-ए-अदब हल्लौर के तत्वावधान में हल्लौर में किया गया।
इस साहित्यिक एवं वैचारिक गोष्ठी की अध्यक्षता सेवानिवृत्ति सहायक सूचना निदेशक व वरिष्ठ उर्दू विद्वान डॉ. वजाहत हुसैन रिज़वी ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि ‘दीवान-ए-ख़ुर्शीद ज़फ़र’ में शास्त्रीय काव्य-परंपरा और आधुनिक वैचारिक-कलात्मक चेतना का अत्यंत सुंदर और सार्थक समन्वय दिखाई देता है, जो कवि के गहन अध्ययन, रचनात्मक दृष्टि और कलात्मक परिपक्वता का प्रमाण है।
समारोह के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध वक्ता एवं विचारक लिसानुल मिल्लत जमाल हैदर रहे, जिन्होंने इस महत्त्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धि पर कवि को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दीं। विशिष्ट अतिथि के रूप में मौलाना गुलाम अब्बास हल्लौरी (रिसर्च स्कॉलर, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने सहभागिता की और ‘दीवान-ए-ख़ुर्शीद ज़फ़र’ को समकालीन उर्दू कविता के लिए एक आदर्श कृति बताया। वहीं सम्मानित अतिथि के रूप में नफ़ीस हल्लौरी ने अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के दौरान बेताब हल्लौरी ने ‘दीवान-ए-ख़ुर्शीद ज़फ़र’ पर प्रकाश डालते हुए उर्दू साहित्यिक जगत को इस उल्लेखनीय कृति के लिए बधाई दी। समारोह का संचालन महबूब अली (रिसर्च स्कॉलर, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) ने अत्यंत सधे और प्रभावशाली ढंग से किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, कविगण और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे, जिन्होंने ख़ुर्शीद ज़फ़र हल्लौरी को उनके काव्य-संग्रह के प्रकाशन पर हृदय से बधाई एवं शुभकामनाएँ दीं।
उल्लेखनीय है कि ख़ुर्शीद ज़फ़र हल्लौरी, पूर्व में अवधनामा अखबार के सम्पादक भी रहे हैं और प्रसिद्ध दीवान-गो कवि अल्लामा समर हल्लौरी के सुपुत्र हैं। ‘दीवान-ए-ख़ुर्शीद ज़फ़र’ उनकी चयनित ग़ज़लों का संकलन है।





