Thursday, February 12, 2026
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यूपीएसआईएफएस में संविधान दिवस के परिपेक्ष्य में काव्य संध्या साहित्य समाज का दर्पण है।: डॉ जी.के. गोस्वामी

खाब आँखों में संजोने की बड़ी जल्दी है, चाँद दरिया में डुबोने की बड़ी जल्दी है: डॉ हरिओम, आईएएस

लखनऊ उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फोरेंसिक साइन्स, लखनऊ में संविधान दिवस के परिपेक्ष्य में उर्दू एकाडमी उत्तर प्रदेश एवं अमृत फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में काव्य संध्या का आयोजन किया गया l संविधान दिवस के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ जीके गोस्वामी ने किया तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ हरिओम थेl

कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि, संस्थान के निदेशक डॉ जीके गोस्वामी), विशिष्ठ डॉ हरिओम, (आईएएस), लोकायतन अध्यक्षा डॉ मालविका हरिओम, अपर पुलिद अधीक्षक जीतेन्द्र श्रीवास्तव, उप निदेशक श्री चिरंजीब मुखर्जी एवं प्रशासनिक अधिकारी श्री अतुल यादव द्वारा सरस्वती प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया l इस अवसर पर निदेशक डॉ गोस्वामी ने समस्त आमंत्रित कवि अतिथियों को अंगवस्त्रम एवं स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया । कार्यक्रम का संयोजन अमृत फौंडेशन कि निदेशक भानु प्रिय ने किया|

इस अवसर पर निदेशक डॉ गोस्वामी जी ने कहा कि साहित्य ही समाज का दर्पण है। साहित्य समाज को जोड़ने का काम करता है। यदि कोई व्यक्ति साहित्य और कला से नही जुड़ा है तो वह अधूरा है। उन्होंने कहा कि जिंदगी में समस्या तो आती रहेंगी लेकिन इसी में हमें जीने के सलीको को भी ढूढना होगा तभी जीवन सफल होगा|
मुख्य अतिथि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ हरिओम ने अपनी ग़ज़ल “ख्वाब आँखों में संजोने कि बड़ी जल्दी है चाँद दरिया में डुबोने बड़ी जल्दी है एक हम हैं कि अभी बचपना नहीं गुजरा एक तुम हो बड़ा होने कि बड़ी जल्दी है ।“ को मधुर स्वर में प्रस्तुत किया | इस गजल ने श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर लिया, सभागार पूरे समय श्रोताओं के तालियों से गूँजता रहा। डॉ हरिओम ने सभागार में नई पीढ़ी को अपने प्रेरणामयी शब्दों से भी संबोधित किया|

इस अवसर पर मशहूर शायर अज्म शाकिरी जब हम अपने घर आये आंख में आसू भर आये,चिडिया रो कर कहती है, क्यों बच्चों के पर आये सुनाकर लोंगो को मन्त्र मुग्ध कर लिया इस अवसर पर मशहूर शायर यासिर सिददीकी ने सुनाया कि “दोस्त तूझसा है तो एहसास ए कदूरत क्या है,सब्र करने के सिवा दूसरी सूरत क्या है,तेज खंजर भी है गर्दन भी है गर्दाब भी है,तेरे होते हुए दुश्मन की जरूरत क्या है! इस रचना पर सभागार में भरपूर तालियां गूंज उठीl लोकप्रिय कवियित्री डॉ मालविका हरिओम ने संविधान दिवस पर “क्यों कर रहे हो जबाबो कि उनसे उम्मीदें , जिन्हें सवाल करना ख़राब लगता है ”। सहित अपनी कई रचनाओं सुना कर श्रोताओं का दिल जीता |

मशहूर शायर वसीम नादिर ने सुनाया कि हवा मिज़ाज बदलती है तब बिखरते है,ख़ुशी से लोग बुलंदी से कब उतरते है”। इस कलाम पर सभागार तालियों से गूंज उठा।
मशहूर शायर फैज़ खुमार बाराबंकवी ने सुनाया कि बात कैसे इधर से उधर हो गई, बेखबर को भी शायद खबर होगी गई,सब्र की एक चादर मेरे पास थी, उम्र सारी इसी में बसर हो गई सुना कर दर्शको में वाहवाही लूटी

मशहूर कवि श्री चंद्रशेखर वर्मा ने सुनाया “ चाक को उल्टा घुमा दे कूज़ागर,फिर मुझे मिट्टी बना दे कूज़ागर,कब से बैठाये हुए है चाक पर, तू मुझे कुछ तो बना दे कूज़ागर”। ने अपनी खुबसूरत रचना सुनाकर सभागार में तालियाँ बटोरी | मशहूर शायर मोईन अलवी ख़ैराबादी ने सुनाया कि आई शब-ए-विसाल है क्या अजब कमाल है, उस पर तिरा जमाल है क्या अजब कमाल है, रुख़ पर नक़ाब डालकर आए हैं आज वो इधर पर्दे में यूं हिलाल है क्या अजब कमाल है” पर सभागार में तालियां गूंज उठीl

मशहूर शायरा हिना रिज़वी हैदर ने सुनाया कि “जिसमें गुज़रे हुए वक़्तों की शिकन हो न कोई, आईने मुझको वही शक्ल पुरानी देना” सुना कर श्रोताओं का दिल जीता |
इस अवसर पर संस्थान के जन संपर्क अधिकारी संतोष ‘कौशिल’ ने सुनाईं- मैं ही नहीं अकेले, मेरे साथ बहुत हैं। सूख गए हैं खेत, मगर बरसात बहुत हैं इसे सुनकर सभागार में तालियों की बौछार हो उठी।

मशहूर हास्यकवि डॉ पंकज प्रसून ने व्यंग सुना कर महफ़िल को ठहाको से भर दिया उन्होंने सुनाया “जंग का आखिरी ऐलान न मानो उसको । अब तो लुगाई से कहीं बेहतर है एआई जाने क्या गुल खिलायेगी इक्कीसवीं सदी लाइक शेयर सब्सक्राइब जिनके मूलमंत्र हैं जेनज़ेड ही अब चलायेगी इक्कीसवीं सदी । पढ़ कर सभागार में तालियां गूंज उठीl
कार्यक्रम में युवा कवि श्री अभिश्रेष्ठ तिवारी ने सुनाया “इतना करम हुआ कि तमाशा नहीं हुआ, वरना तुम्हारी सम्त से क्या-क्या नहीं हुआ, हमने कहा था धोके से मारेगी ज़िंदगी, देखा हमारी आँख से धोखा नहीं हुआ” । सुनाकर कर तालियाँ बटोरी l

युवा कवि सूर्य प्रकाश सूरज ने सुनाया धूप की पाँखों में पलती पीर कोई,मैं कि इक सूखी नदी का तीर कोई” सुनाया आशीष कुमार आस ने सुनाया मेरे चाहत में हर गम भुला सकती हो क्या कार्यक्रम के अंत मे संस्थान के उप निदेशक श्री चिरंजिब मुखर्जी ने आभार ज्ञापन कर कार्यक्रम के औपचारिक समापन की घोषणा की । कार्यक्रम का सञ्चालन जनसंपर्क अधिकारी श्री संतोष ‘कौशिल’ ने किया |

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