नारी होती है संस्कृति एवं सभ्यता की वाहक
डॉक्टर शेफालिका रायनारी जननी है जीवन की, संसार को थलायमान रखने में उसकी महत्ती भूमिका होती है। नारी न केवल जीवन की वाहक है, वरन अपने आप में संस्कृति एवं सभ्यता की वाहक होती है। नारी संवेदनशीलता एवं सहनशीलता से युक्त वह प्रतिबिम्ब है जो समाज को उत्साह से भर देती है और आगे बढ़ने की राह दिखाती है। अपने जीवन काल में वह अनेक रंगों को समाहित करती है। वैदिक काल में स्त्री के लिए कहा गया है कि ‘पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षण्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति’
जिसका अर्थ होता है कि नारी की रक्षा उसकी आयु के अनुसार शादी से पहले उसकी रक्षा की जिम्मेदारी पिता की होती है शादी के बाद उसकी रक्षा उसका पति करता है बाद मे आयु और अवस्था के अनुसार उसकी रक्षा पुत्र करता है
किन्तु समय के साथ स्त्रियों ने इस परिभाषा को अपने लिए बदल दिया है। नारी अपने आयु के अनुसार पिता, पति, व पुत्र पर निर्भर नहीं है बल्कि वो बेटी, पत्नी, व माँ के रूप में एक पुरुष के रिक्त जीवन के कैनवस को उमंग के रंगों से भरती व संजोती है। लेकिन सबके जीवन में रंग भरने वाली स्त्री के जीवन को अपमान, शारीरिक एवं मानसिक हिंसा के द्वारा समय समय पर समाज में आाहत होना पड़ता है।
यह प्रश्न उठता है की महिलाओं के सुरक्षा एवं सम्मान पर चर्चा करने एवं नीतियों के निर्माण की आवश्यकता कब तक है? क्या इतने प्रयासों के उपरांत भी महिलाये सशक्त नहीं है? जबकि आर्थिक रूप से अधिकांशतः नारी सक्षम है।
यह इस बात को परिलक्षित करता है कि आर्थिक स्वालम्बन से स्वयं के शारीरिक एवं मानसिक विकास को पाया जा सकता है, किन्तु एक महिला सुरक्षित रहे इसके लिए पुरे समाज को मानसिक तौर पर स्वस्थ होना पड़ेगा। शासन द्वारा निरंतर नीतियों का निर्माण किया जा रहा है। उसके साथ ही इसके प्रचार प्रसार हेतु विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। महिलाओं की सुरक्षा हेतु 181 112 1090, 1091, इत्यादि हेल्पलाइन नंबर को सरकार द्वारा जारी किया गया है। जो सुचारु रूप से कार्य भी करते रहे है। महिलाये आर्थिक रूप से सक्षम हो इसके लिए बैंकों के माध्यम से विविध वित्तीय सुविधाये जैसे मुद्रा लोन स्टैंड अप इण्डिया, महिला सम्मान बचत पत्र, कन्या सुमंगला योजना, महिला स्वयं सहायता समहू को बैंक ऋण इत्यादि प्रदान की जा रही है। सम्भवतः इन नीतियों और प्रयासों का ही परिणाम है की महिलाये समाज के हर क्षेत्र में आगे है भले ही उनकी संख्या बहुत कम है किन्तु कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ उनकी उपस्थिति दर्ज न हो।
महिलाये स्वयं के विकास के लिए प्रयासरत हो यह भी अति आवयश्क है, क्योकि नीतिया और योजनाए अपने उद्देश्य को तभी प्राप्त कर सकती है जब उसका उपयोग उसके द्वारा किया जाये जिसके लिए वो बनी है। महिलाओ को सशक्त बनाने के दो पक्ष है एक उनका सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सशक्तिकरण, जिसके लिए सरकार समाजिक संगठनों एवं स्वयं महिलाओ द्वारा भी निरंतर प्रयास किया जा रहा है। वही इसका दूसरा पक्ष है महिलाओ के सुरक्षा एवं सम्मान का क्योकि पह विचारणीय प्रश्न है की उच्च पदों पर कार्यरत जिसमें प्रशासन से सम्बन्धित महिलाये साथ ही डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, इंजीनियर जिनकी समाज को एक दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भमिका होती है, उनका भी जब शारीरिक एवं मानसिक उत्त्पीडन होता है तो यक्ष प्रश्न सामने आता है (विशेष कर उन महिलाओ और बच्चियों के मन में जिन्होंने इनको अपना रोल मॉडल माना होता है) ये तो हर प्रकार से सशक्त है आर्थिक एवं सामाजिक दोनों रूपों में तो इनके साथ ऐसा कैसे हुआ।
निरंतर होने वाली घटनाये हमारे प्रयासों पर प्रश्न कर रही है आज की आवश्यकता है समस्या के दूसरे पहलू पर मंथन करने की। समस्या के जड़ो तक पहुंचने की और उसको समाप्त करने का प्रयास करना होगा। सोच और वातावरण को स्वच्छ करने की, सामाजिक एवं पारवारिक मूल्यों के पुनर्चिन्तन की आवश्यकता है। इसके लिए सबसे बड़ा प्रयास महिलाओं को ही करने की आवश्यकता है। हर बेटी, पत्नी और माँ को प्रश्न करना चाहिए अपने पिता से पति से और पुत्र से, जब उसे दिखाई दे उनकी आँखों में किसी भी महिला के प्रति अनादर के भाव, या शब्दों में अपमान का थोड़ी मात्रा में भी प्रयोग। उनको राह दिखनी चाहिए स्त्रियों के सम्मान की। बेटियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना तो अत्यंत आवश्यक है किन्तु इसके साथ ही साथ बेटी एवं बेटे दोनों को ही संस्कृति एवं सभ्यता से परिचित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बेटियों को आर्थिक रूप से स्वालम्बी होने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ उनको मलत के खिलाफ बोलने की भी शिक्षा घर से प्रदान किया जाये। बेटों को भी यह सीखाना अत्यंत आव्यश्यक है कि उनका पूरा अस्तित्व जो ईश्वर के आशीर्वाद के उपरांत एक नारी के द्वारा निर्मित है, उनका यह कर्तव्य है की वो इस ऋणसे मुक्त होने के लिए हर नारी की सुरक्षा एवं सम्मान के लिए प्रयास करे।
यदि विभिन स्तरों पर होने वाले अनर्गल प्रलापों को सुनने के बजाय उन पर विराम लगा दिया जाये तभी हम सम्भवतः ऐसे समाज का निर्माण कर सके जो महिलाओ को उड़ने के लिए पंख प्रदान करे किन्तु साथ ही सुरक्षित आसमान भी जैसा की स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है की ‘ महिलाओ की स्थिति में सुधार के बिना किसी समाज का कल्याण नहीं हो सकता है, क्योकि पंक्षी के लिए एक पंख से उड़ना मुश्किल है। देश की तरक्की के लिए हमे महिलाओ को सशक्त बनाना होगा।
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